Thursday, November 25, 2010

Desh Ratna's Collection -- Sher-o-Shayari - कश्ती-और-तूफ़ान

अगर ऐ नाखुदा तूफान से लड़ने का दमखम है,
इधर कश्ती को मत लाना, इधर पानी बहुत कम है।

1.नाखुदा - मल्लाह, केवट, नाविक, कर्णधार
2. दमखम - शक्ति, हिम्मत, उत्साह, उमंग, हौसला

*****

उम्मीदी-नाउम्मेदी का वहम होना वही जाने,
कि जिसने कश्तियों को डूबते देखा हो साहिल पर।
साहिल-किनारा।

*****

कनारों से मुझे ऐ नाखुदा तुम दूर ही रखना,
तहाँ लेकर चलो तूफां जहाँ से उठने वाला है।

1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार

*****

कश्ती को भंवर में घिरने दो, मौजों के थपेड़े सहने दे,
जिन्दों में अगर जीना है तुम्हें, तूफान की हलचल रहने दे।
-सागर

*****

कहा था सबने, डूबेगी यह कश्ती,
मगर हम जानकर बैठे उसी में।
-खलीक बीकानेरी

*****

किश्ती को तूफान से बचाना तो सहज है,
तूफान के वकार का दिल टूट जायेगा।
-नरेश कुमार 'शाद'

1.वकार - प्रतिष्ठा, इज्जत
*****

खेलना जब उनको तूफानों से आता ही न था,
फिर वो कश्ती के हमारे, नाखुदा क्यों हो गये।
-'अफसर' मेरठी

1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, केवट, कर्णधार

*****

खोला है किसने अपने सफीने का बादबां,
तूफां सिमट गये हैं कनारों की गोद में।

1. सफीना - नाव, नौका, कश्ती
2.बादबां - पोतपट, मरूतपट, जहाज में
लगाया जाने वाला पर्दा, जिसमें हवा भरने से जहाज चलता है।

*****

जब कश्ती साबितो-सालिम थी, साहिल की तमन्ना किसको थी,
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर, साहिल की तमन्ना कौन करे।
-मुइन अहसन 'जज्बी'

1. साबितो-सालिम - ठीकठाक 2. साहिल - किनारा, तट
3. शिकस्ता - टूटी हुई

*****

जरा थमे जो यह तूफां तो हो कुछ अन्दाजा,
कहाँ हूँ मैं कहाँ कश्ती, कहाँ किनारा है।

*****

तूफाँ बड़े गरूर से ललकारता रहा,
कश्ती बड़ी नियाज से जिद पर अड़ी रही।
-अब्दुल हमीद 'अदम'

1. नियाज - निष्ठा

*****

तूफाँ से खेलना अगर इन्सान सीख ले,
मौजों से आप उभरें, किनारे नये-नये।
-'असर' लखनवी

*****

तूफान कर रहा था मेरे अज्म का तवाफ,
दुनिया समझ रही थी कश्ती भंवर में है।

1.अज्म - संकल्प, साहस, दृढ़, निश्चय
2.तवाफ - परिक्रमा, चक्कर काटना

*****

तौहीने - जिन्दगी है कनारे की जुस्तजू,
मझदार में सफीना - ए - हस्ती उतार दे।
फिर देख की उसका रंग निखरता है किस तरह
दोशीजए - खिजां को खिताबे – बहार दे।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.जुस्तजू - तलाश, खोज 2.हस्ती - जीवन नौका 3. दोशीजए-खिजां- पतझड़ रूपी युवती 4.खिताबे–बहार - बहार का नाम या बहार की संज्ञा

*****

धारे के मुआफिक बहना क्या, तौहीने-दस्तोबाजू है,
पर्रवर्दए-तूफाँ किश्ती को, धारे के मुखालिफ बहने दे।
सागर निजामी

1. मुआफिक - ओर 2. पर्रवर्दए-तूफाँ - तूफान में पले हुए या पली हुई

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पर्वर्द-ए-तूफां इन्सां को, कश्ती की नहीं हाजत,
मौजों के तलातुम में उनको, साहिल नजर आता है।
-जिगर मुरादाबादी

1.पर्वर्द-ए-तूफां - तूफान में पले हुए 2. हाजत - जरूरत, आवश्यकता
3. मौजों - लहरें 4. तलातुम - हलचल 5. साहिल - किनारा, तट

*****

भरोसा है खुदी पर, नाखुदा की इल्तिजाकैसी,
मेरी कश्ती ही साहिल है, मेरी कश्ती में साहिल है।
-दाग
1.खुदी - स्वयं 2. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
3. इल्तिजा - प्रार्थना, दरखास्त 4. साहिल - किनारा, तट

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मझदार में जब कश्ती पहूँची, कश्ती वालों पै क्या गुजरी,
यह तूफानों की बातें हैं, आसूदा-ए-साहिल क्या जाने।
-जगन्नाथ आजाद

1. आसूदा-ए-साहिल - किनारे पर रहकर संतोष करने वाले

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यूँ ही डूबोता रहा अगर किश्तियाँ सैलाब,
तो सतहे-आब पै चलना भी आ ही जायेगा।

1. सैलाब - बाढ़ 2. सतहे-आब - पानी की सतह

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मरने की दुआयें क्यों माँगू जीने की तमन्ना कौन करे,
ये दुनिया या वो दुनिया अब ख्वाहिशे-दुनिया कौन करे?
जब कश्ती साबितो-सालिम थी, साहिल की तमन्ना किसको थी,
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर, साहिल की तमन्ना कौन करें?
-मुईन अहसन जज्बी

1.साबितो-सालिम - ठीकठाक, सही हालत में
2.साहिल - किनारा, तट 3.शिकस्ता - टूटी हुई

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मैंने यूं कश्ती का रूख सू-ए-तूफां कर दिया,
साजगारे-दिल हवा-ए-दामने-साहिल न था।
-'अलम' मुजफ्फरनगरी

1.सू-ए-तूफां - तूफान की ओर 2. साजगारे-दिल - दिल के मुआफिक या अनुकूल, जो बात दिल को पसंद आ जाए
3. हवा-ए-दामने-साहिल - साहिल के आँचल की हवा

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Desh Ratna's Collection -- Sher-o-Shayari - जिंदादिली

अगर खो गया इक निशेमन तो क्या गम,
मुकामाते - आहो - फुगाँ और भी है।
कनाअत न कर आलमे-रंगो - बू पर,
चमन और भी आशियाँ और भी हैं।
तू शाही है परवाज है काम तेरा,
तेरे सामने आसमाँ और भी है।
-मोहम्मद इकबाल

1.निशेमन - आशियाना, घोंसला, नीड़
2. मुकामात - (i) स्थान, जगह (ii) पड़ाव, मंजिल (iii) प्रतिष्ठा, इज्जत
3. फुगाँ - आर्तनाद, फरियाद, नाला 4. कनाअत - पर्दा
5. आलमे-रंगो - बू - रंग और खुशबू की दुनिया (यानी दुनिया की रंगीनियाँ)
6. शाही - बाज पक्षी, श्येन 7.परवाज - उड़ान, उड़ना

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अगर छुट गये कारवाँ से तो क्या गम,
कभी शामिले - कारवाँ भी रहे हैं।
-मुजीब

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अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने-अक्ल,
लेकिन कभी-कभी इसे तन्हा भी छोड़ दें।
-मोहम्मद इकबाल

1. पासबाने - द्वारपाल, प्रहरी

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अपनी तबाहियों का मुझे कोई गम नहीं,
तुमने किसी के साथ मुहब्बत निभा तो दी।
-साहिर लुधियानवी

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अभी आस टूटी नहीं है खुशी की,
अभी गम उठाने को जी चाहता है।
तबस्सुम हो जिसमें निहाँ जिन्दगी का,
वह आंसू बहाने को जी चाहता है।
-'अदीब' मालीगाँवी

1.तबस्सुम - मुस्कान, मुस्कुराहट 2.निहाँ - छुपा हुआ।

असीरों के हक में यही फैसला है,
कफस को समझते रहें आशियाना।
-दिल शाहजहांपुरी

1.असीर - बंदी, कैदी 2.कफस - पिंजड़ा, कैद
3. आशियाना - घोंसला, नीड़

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आज तारीकिए-माहौल से दम घुटता है,
कल खुदा चाहेगा 'तालिब' तो सहर भी होगी।
-तालिब देहलवी

1.तारीकी- अंधकार, अंधेरा, धुंधलापन 2. सहर - सुबह, सबेरा

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आता है जज्बे-दिल को यह अंदाजे-मैकशी,
रिन्दों में रिन्द भी रहें,दामन भी तर न हो।
-जोश मल्सियानी

1.जज्बे-दिल - दिल की कशिश 2. अंदाजे-मैकशी - शराब पीने का अंदाज 3.रिन्द - शराबी

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आदमी को सिर्फ वहम है, पास उसके ही इतना गम है,
पूछो हंसते हुए चेहरों से, आंख भीतर से कितनी नम है।

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इक तबस्सुम हजार शिकवों का,
कितना प्यारा जवाब होता है।

1.तबस्सुम - मुस्कान, मुस्कुराहट

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इक न इक जुल्मत से जब वाबस्ता रहना है 'जोश',
जिन्दगी पर साया - ए -जुल्फे-परीशाँ क्यों न हो।
-जोश मलीहाबादी

1.जुल्मत - अंधियारा, अंधेरा, अंधकार, तिमिर 2. वाबस्ता - जुड़ा रहना 3. साया-ए-जुल्फे-परीशाँ - बिखरी जुल्फों का साया

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इक नई बुनियाद डालेंगे तजस्सुम की 'शफा',
हर गुबारे-कारवाँ में कारवाँ ढूंढ़ेंगे हम।
-शफा ग्वालियरी

1.तजस्सुम - खोज, तलाश 2. गुबार - धूल, रज, गर्द।

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इन बेनियाजियों पै दिल है रहीने-शौक,
क्या जाने इसको क्या हो, जो परवा करे कोई।
-त्रिलोकचन्द महरूम

1.बेनियाजी- उपेक्षा, अनदेखी, बेरूखी
2. रहीने-शौक - उत्साहित, लालायित

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इन्हीं गम की घटाओं से खुशी का चाँद निकलेगा,
अंधेरी रात के पर्दों में दिन की रौशनी भी है।

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इन्हीं जर्रों से कल होंगे नये कुछ कारवाँ पैदा,
जो जर्रे आज उड़ते हैं गुबारे-कारवाँ होकर।
-'शफक' टौंकी

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इशरतकदे को खाना-ए-वीरां बनायेंगे,
छोटे से अपने घर को बियाबाँ बनायेंगे।
-मिर्जा गालिब

1. इशरतकदा - आनन्द महल, रंगभवन
, रंगशाला, रंगमहल 2. खाना-ए-वीरां - वीरान घर
3. बियाबाँ - जंगल, कानन

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इशरते-सोहबते-खूबाँ ही गनीमत समझो,
न हुई 'गालिब' अगर उम्रे-तबीई न सही।
-मिर्जा गालिब

1. इशरते-सोहबते-खूबाँ - हसीनों की सोहबत का आनन्द
2.तबीई - प्राकृतिक

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उजाला तो हुआ कुछ देर को सहने-गुलिस्ताँ में,
बला से फूँक डाला बिजलियों ने आशियाँ मेरा।
-मिर्जा गालिब

1.सहन - आँगन
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उनको देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक,
वह समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल को खुश रखने को 'गालिब' ये ख्यालअच्छा है।
-मिर्जा गालिब

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उनपै हँसिये शौक से जो माइले-फरियाद है,
उनसे डरिये जो सितम पर मुस्कुराकर रह गये।
-'असर' लखनवी

1.माइल - आसक्त, आशिक, प्रवृत्त, झुकाव रखने वाला आमादा
2. फरियाद - (i) सहायता के लिए पुकार, दुहाई (ii) शिकायत, परिवाद
(iii) आर्तनाद, दुख की आवाज (iv) नालिश, न्याय याचना।
3. सितम - जुल्म, अत्याचार

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उम्र भर रेंगते रहने से तो बेहतर है,
एक लमहा जो तेरी रूह में वुसअत भर दे।
-'साहिर' लुधियानवी

1.वुसअत - (i) शक्ति, ताकत, सामर्थ्य (ii) उदारता (iii) विस्तार

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उम्र फानी है तो फिर मौत से क्या डरना,
इक न इक रोज यह हंगामा हुआ रखा है।
-मिर्जा 'गालिब'

1.फानी - नश्वर, नाशवान, मिट जाने वाला, न रहने वाला।
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उस अश्क की तासीर से अल्लाह बचाये,
जो अश्क आंखों में रहे और न बरसे।

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एक हंगामे पै मौकूफ है घर की रौनक,
नौहा-ए-गम ही सही, नग्मा-ए-शादी न सही।
-मिर्जा गालिब

1.मौकूफ - आधारित, निर्भर 2. नौहा-ए-गम - गमी का शोक, गमी में रोना-पीटना। 3. शादी - (i) हर्ष, आनन्द (ii) विवाह, व्याह

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एक हँसती हुई परेशानी,
वाह क्या जिन्दगी हमारी है।

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एक लमहा भी मसर्रत का बहुत होता है,
लोग जीने का सलीका ही कहाँ रखते हैं।

1. मसर्रत - आनन्द, हर्ष, खुशी

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एहतिरामे-खिजाँ करो यारों,
यह नवेदे-बहार होती है।
-अब्दुल हमीद 'अदम'

1.एहतिरामे-खिजाँ - पतझड़ ऋतु का स्वागत 2. नवेदे-बहार - बहार के आने की शुभ सूचना, बहार के आगमन की खुशखबरी

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ऐ गमे-दुनिया न हो नाराज,
मुझको आदत है मुस्कुराने की।
-अब्दुल हमीद अदम

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ऐ शम्अ तेरी उम्र तवाई है एक रात,
रोकर गुजारा दे इसे, या हँसकर गुजार दे।
-अब्राहम जौक

1. तवाई - तवील, लंबी

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ऐ दिल जो हो सके तो लुत्फे-गम उठा ले,
तन्हाइयों में रो ले, महफिल में मुस्कुरा ले।
जिस दिन यह हाथ फैले अहले-करम के आगे,
ऐ काश उसके पहले हमको खुदा उठा ले।
-'शमीम' जयपुरी

1. अहले-करम - मेहरबानी करने वाले

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ऐ मौत आ के हमको खामोश तो कर गई तू,
मगर सदियों दिलों के अंदर, हम गूंजते रहेंगे।
-फिराक गोरखपुरी

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ऐसा लगता है, हर इम्तिहाँ के लिए,
किसी ने जिन्दगी को हमारा पता दे दिया है।

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कट गई यह बहरे-गमे मौजों से हँसते-खेलते,
बहते-बहते देख आखिर आ लगे साहिल से हम।
- फिराक गोरखपुरी

1.बहरे-गमे - गमों का सागर
2. मौज - लहर, तरंग 3. साहिल - तट, किनारा

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कफस में खींच ले जाये मुकद्दर या नशेमन में,
हमें परवाजे-मतलब है, हवा कोई भी चलती हो।
-सीमाब अकबराबादी

1.नशेमन - आशियाना, घोंसला, नीड़ 2. परवाज - उड़ान

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कभी शाखे-सब्जा-ओ- बर्ग पर, कभी गुंचा-ओ-गुलो -खार पर,
मैं चमन में चाहे जहाँ रहूँ, मुझे हक है फस्ले - बहार पर।
-जिगर मुरादाबादी

1.शाखे-सब्जा - हरियाली से भरी टहनी 2. बर्ग -पत्ता, पत्ती 3.गुंचा - कली 4.फस्ले - बहार - बसन्त ऋतु, बहार का मौसम

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कर्ज की पीते थे मय, लेकिन समझते थे कि हाँ,
रंग लायेगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।
-मिर्जा गालिब

1.मय - शराब, मदिरा
2. फाकामस्ती - फाकों (निराहार, उपवास, अनशन) में बसर करना।

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कल जो अपने थे अब पराये हे, क्या सितम आसमाँ ने ढाये है,
दिल दुखा होंठ मुस्कराये है, हमने ऐसे भी गम उठाये हैं।
-'बेताब' अलीपुरी

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कहाँ दूर हट के जायें, हम दिल की सरजमीं से,
दोनों जहां की सैरें, हासिल है सब यहीं से।
-जिगर मुरादाबादी

1.सरजमीं - (i) पृथ्वी, जमीन (ii) देश, मुल्क

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कांटों से घिरा रहता है चारों तरफ से फूल,
फिर भी खिला ही रहता है, क्या खुशमजाज है।

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कारगाहे-हयात में ऐ दोस्त यह हकीकत मुझे नजर आई,
हर उजाले में तीरगी देखी, हर अंधेरे में रौशनी पाई।
-जिगर मुरादाबादी

1.कारगाह - कार्यालय, काम करने का स्थान 2. हयात - जिन्दगी 3.तीरगी - अंधेरा, अंधकार

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Desh Ratna's Collection - Sher - नक़ाब

तेरे और उसके दरमियाँ, तेरी खुदी हिजाब है,
अपना निशान खोयेजा, उसका निशान पायेजा।
-अख्तर शीरानी

1.खुदी - अहंकार, घमंड, अहंभाव, यह भाव कि बस हमीं हम हैं,अभिमान 2.हिजाब - पर्दा

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नहीं है राज कोई राज दीदावर के लिये,
नकाब पर्दा नहीं शौक की नजर के लिये।
-आर्श मल्सियानी

1.दीदावर - जोहरी, पारखी, किसी चींज के गुण-दोष को
अच्छी तरह समझने वाला

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हिजाबे-जलवा की अहले-नजर परवा नहीं करते,
वह तो पर्दों में भी उनका रू-ए-जेबा देख लेते हैं।
-जोश मल्सियानी

1.हिजाबे-जलवा - बनाव-सिंगार पर घूँघट डालना
2. अहले-नजर - नजर वाले 3.रू-ए-जेबा - सुन्दर मुखड़ा या चेहरा

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जलवे की रोकथाम करेगा हिजाब क्या,
दरिया के आगे आबे-रवाँ की बिसात क्या?
-हसन बरेलवी

1.हिजाब - (i) आड़, पर्दा, ओट (ii) मुखावरण, बुर्का, पर्दा
2.आबे-रवाँ - तेजी से बहता पानी 3.बिसात - साहस, हिम्मत, सामर्थ्य

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नकाबे-रूख उलटने तक तो मुझको होश था लेकिन,
भरी महफिल मं उसके बाद क्या गुजरी खुदा जाने।
-सईद अहमद खां

1. नकाबे-रूख - मुखावरण ,मुखपट, पर्दा

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मुझको यह आरजू है वह उठाएं नकाब खुद,
उनकी यह इल्तिजा तकाजा करे कोई।
-मजाज

1.नकाब - घूँघट, मुखावरण, मुखपट 2.इल्तिजा - प्रार्थना, दरखास्त
3.तकाजा - माँग, फर्माइश

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वह बेनकाब कहीं बेनकाब होता है,
कि आफताब खुद अपना हिजाब होता है।
-'नातिक' लखनवी

1.आफताब - सूरज, सूर्य 2.हिजाब - (i) आड़, पर्दा, ओट (ii) लाज, शर्म

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हया बेहोश होकर गिर रही है,
किसी की बेहिजाबी तौबा-तौबा।
-अब्दुल हमीद 'अदम'

1.हया - लज्जा, शर्म, व्रीड़ा 2.बेहिजाबी - घूँघट उठाना
3. तौबा-तौबा - किसी बुरे काम से बाज रहने की दृढ़ प्रतिज्ञा

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है देखने वालों को संभलने का इशारा,
थोड़ी-सी नकाब वह सरकाये हुए हैं।
-अर्श मल्सियानी

1. नकाब - घूँघट, मुखावरण, पर्दा, बुर्का

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यह शर्मगीं निगाह,यह तबस्सुम निकाब में,
क्या बेहिजबियाँ है, तुम्हारे हिजाब में।
-जकी

1.शर्मगीं - शर्म से झुकी हुई
2.तबस्सुम - मुस्कान, मुस्कराहट, स्मित, मंदहास
3.निकाब - (i) घूँघट, मुखावरण, मुखापट (ii) ओट, आड़
4.बेहिजबियाँ - घूँघट हटा देना 5. हिजाब - आड़, पर्दा, ओट

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नकाब कहती है मैं पर्दा-ए-कयामत हूँ,
अगर यकीं न हो तो देख लो उठा के मुझे।
-'जलील' मानिकपुरी

1.नकाब - मुखवरण, मुखपट, पर्दा, बुर्का

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नकाब उनके चेहरे का सरका है शायद,
बड़ी दूर तक बर्क लहरा नहीं है।
-अब्दुल हमीद 'अदम'

1.बर्क - बिजली, सौदामिनी, , तड़ित, चंचला

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फैला है हुस्ने-आरिजे-रौशन नकाब में,
क्या-क्या तड़प रही है तजल्ली हिजाब में।
-साकिब लखनवी

1.हुस्ने-आरिजे-रौशन - उज्जवल गाल का सौन्दर्य 2. नकाब - घूँघट, मुखावरण, मुखपट, बुर्का 3.तजल्ली - प्रकाश, आभा, नूर

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बताइए रहेगी शम्अ किस तरह हिजाब में,
यह क्या समझ के हुस्न को छुपाया है निकाब में।
-'साकिब' लखनवी

1.हिजाब - (i)आड़, पर्दा, ओट (ii) लज्जा , लाज, शर्म
2. निकाब - मुखावरण, मुखपट, बुर्का, घूँघट, ओट, आड़

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उठा सके आदमी तो पहले नजर से अपनी नकाब उठाए,
जमाने भर की तजल्लियों से नकाब उल्टी हुई मिलेगी।
-नवाब झांसवी

1.नकाब - पर्दा, घूँघट, ओट, आड़ 2.तजल्लियों - (i) आभा, प्रकाश, नूर, रौशनी (ii) प्रताप, जलाल (iii) अध्यात्मज्योति, नूरे-हक

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एक से लगते हैं सब ही कौन अपना, कौन गैर,
बेनकाब आये कोई तो, हम दरे -दिल वा करें।
-खलील

1.दरे–दिल - दिल का दरवाजा 2. वा - खोलना

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Desh Ratna's Collection - Sher "ख़ुदा "

अपना तो आशिकी का किस्सा-ए-मुख्तसर है,
हम जा मिले खुदा से दिलबर बदल-बदल कर।

1.मुख्तसर - संक्षिप्त कहानी

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अब तो चलते हैं बुतकदे से ऐ 'मीर',
फिर मिलेंगे गर खुदा लाया।
-मीरतकी मीर

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आदम को मत खुदा कहो, आदम खुदा नही,
लेकिन खुदा के नूर से, आदम जुदा नहीं।

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आशिकी से मिलेगा खुदा,
बंदगी से खुदा नहीं मिलता।
-दाग


इक नहीं मांगी खुदा से आदमीयत की रविश,
और हर शै के लिए बंदे दुआ करते रहे।

1. रविश- शैली, तर्ज, आचार-व्यवहार

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इन्सान की बदबख्ती अन्दाज से बाहर है,
कमबख्त खुदा होकर भी बंदा नजर आता है।

1.बदबख्ती - बदनसीबी, बदकिस्मती
2.कमबख्त - अभागा, भाग्य का मारा, वदकिस्मत

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इलाही कैसे होते है जिन्हें है बंदगी की ख्वाहिश,
हमें तो शर्म दामनगीर होती है खुदा होते हुए।
-मीरतकी मीर

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कह दे ये कोई जाकर दुनिया के बागबाँ से ,
गुल मुतमइन नहीं हैं, तरतीबे-गुलिस्ताँ से।
-एहसन दानिश

*****


कहने को यूँ जहाँ में हजारों हैं यार-दोस्त
मुश्किल के वक्त एक है, परवरदिगार दोस्त।
-असीर

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कुछ लोगों से जब तक मुलाकात न हुई थी
मैं भी यह समझा था, खुदा सबसे बड़ा है।

*****

खिरदमंदों से क्या पुछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तिहा क्या है,
खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?
-मोहम्मद इकबाल

1.खिरदमंद - बुद्धिमान, अक्लमंद 2.इब्तिदा - प्रारम्भ, आरम्भ, शुरूआत 3. इन्तिहा - अंत, आखिरी हद या छोर 4. रजा - इच्छा, तमन्ना, ख्वाहिश

*****

खुदा तौफीक देता है उन्हें जो यह समझते हैं,
कि खुद अपने ही हाथों से बना करती हैं तकदीरें।
-'अफसर' मेरठी

1.तौफीक - (i) दैव योग से ऐसे कारण पैदा हो जाना जिससे अभिलषित वस्तु की प्राप्ति में सुगमता हो, ईश्वर की कृपा, दैवानुग्रह (ii) सामर्थ्य, शक्ति (iii) योग्यता, पात्रता, अहलियत

*****


खुदा और नाखुदा मिलकर डुबो दें यह तो मुमकिन है,
मेरी वजहे-तबाही सिर्फ तूफां हो नहीं सकता।
-सीमाब अकबराबादी

1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, केवट, कर्णधार

*****

खुदा तो इक तरफ, खुद से भी कोसों दूर होता है,
बशर जिस वक्त ताकत के नशे में चूर होता है।

1. बशर - मानव, आदमी, मनुष्य

*****

खुदा या नाखुदा अब जिसको चाहो बख्श दो इज्जत,
हकीकत में तो कश्ती इत्तिफाकन बच गई अपनी।
-गोपाल मित्तल

1. कश्ती - नौका, नाव

*****

खुदाबंदा मेरी गुमराहियों पर दरगुजर फरमां,
मै उस माहौल में रहता हूँ जिसका नाम दुनिया है।
-'अकबर' हैदरी

1. खुदाबंदा -. हे ईश्वर, हे खुदा 2. गुमराहियों-. गलतियों, गुनाहों, रास्ता भूलना 3. दरगुजर - दोष देखकर उसे अनदेखा कर देना, चश्मपोशी

*****


खुदी की इब्तिदा यह थी कि अपने आप में गुम थे,
खूदी की इन्तिहा ये है कि खुदा को याद करता हूँ।

1.खुदी - यह भाव कि बस हमीं हम है, अहंकार, गर्व, घमंड
2.इब्तिदा - शुरूआत, आरम्भ

*****

खुलूसे-दिल से हो सिज्दे तो उन सिज्दों का क्या कहना,
सरक आया वहीं काबा, जहां हमने जबीं रख दी।

1.खुलूसे-दिल - सच्चे दिल से, निष्कपट दिल से 2. काबा - मक्के की एक इमारत जिसे मुसलमान ईश्वर का घर मानते हैं 3. जबीं - माथा, भाल

*****

छोड़ा नहीं खुदी को, दौड़े खुदा के पीछे,
आसां को छोड़ बंदे, मुश्किल को ढूंढ़ते हैं।

1.खुदी - अहंकार, अभिमान, यह भाव कि हमीं हम है

*****

'जफर' आदमी उसको न जानिएगा,
हों वो कैसा ही साहिबे-फहमो-जका।
जिसे ऐश में यादे - खुदा न रहा,
जिसे तैश में खौफे - खुदा न रहा।
-'जफर'

1.साहिबे-फहमो-जका - समझ-बूझ वाला, विवेकशील, समझदार
2. ऐश - भोग-विलास, खाने-पीने का आनन्द, विषयवासना
3.तैश - क्रोध, कोप, गुस्सा

*****


जहाँ सिज्दे को मन आया वहीं पर लिया सिज्दा,
न कोई संगे - दर अपना न कोई आस्तां अपना।

1.सिज्दा - ईश्वर के लिए सर झुकाना, नमाज में जमीन पर सर रखना
2संगे–दर - चौखट 3. आस्तां - दहलीज, ड्योढ़ी, चौखट.

*****

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता दे जहां पर खुदा नहीं।

1.जाहिद - संयम, नियम और जप-तप करने वाला व्यक्ति

*****

जिन्दगीअपनी जब इस शक्ल से गुजरी 'गालिब',
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे।
-मिर्जा 'गालिब'

*****

तिफ्ल-ए-शीरख्वार को ज्यों-ज्यों शऊर हो चला,
जितना खुदा के पास था, उतना ही दूर हो चला।

1.शीरख्वार - दूध मुंहा बच्चा
2.शऊर - (i) विवेक, समझ, अच्छे-बुरे की पहचान
(ii) सभ्यता, तमीज (iii) शिष्टता, सलीका

*****


तेरा करम तो आम है दुनिया के वास्ते,
मैं कितना ले सका, मुकद्दर की बात है।

1. करम - कृपा, मेहरबानी

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दावर के सामने बुते-काफिर को क्या कहें,
दोनों की शक्ल एक है, किसको खुदा कहूँ
मारो भी तुम, जिलाओ भी तुम तुमको क्या कहूँ,
तुमको खुदा कहूँ या खुदा को खुदा कहूँ।
-रियाज खैराबादी

1. दावर – ईश्वर 2.बुते-काफिर - बेहद हसीन औरत

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बंदे न होंगे जितने खुदा हैं खुदाई में,
किस-किस खुदा के सामने सिज्दा करे कोई।

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यही हुस्नो-इश्क का राज है कोई राज इसके सिवा नहीं
जो खुदा नहीं तो खुदी नही, जो खुदी नहीं तो खुदा नहीं।
-जिगर मुरादाबादी

1.खुदी - (i) यह भाव की हम है (ii) अहंकार, अभिमान, घमंड
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रकीबों ने रपट लिखवाई है यह जा के थाने में,
कि 'अकबर' नाम लेता है खुदा का इस जमाने में।
-अकबर इलाहाबादी

1.रकीबों - प्रतिद्वंदियों, एक स्त्री से प्रेम करने वाले दो व्यक्ति परस्पर रकीब होते हैं।

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रिन्दाने-जहां से ये नफरत, ऐ हजरते-वाइज क्या कहना,
अल्लाह के आगे बस न चला, बंदों से बगावत कर बैठे।
-फैज अहमद 'फैज'

1.रिन्दाने-जहां - मैकशी की दुनिया यानी शराब पीने वाले
2.हजरते-वाइज - धर्मोपदेशक महोदय

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सिज्दे करते भी हैं इंसां खुद दरे-इंसां पै रोज,
और फिर कहते भी है, बंदा खुदा होता नहीं।
-अर्श मल्सियानी

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हम खुदा थे गर न होता दिल में कोई मुद्दआ,
आरजूओं ने हमारी हमको बंदा कर दिया।

1.मुद्दआ - (i) स्वार्थ, गरज (ii) मतलब, आशय (iii) उद्देश्य, मंशा

*****

हर जर्रा चमकता है, अनवारे – इलाही से,
हर सांस यह कहती है, हम हैं तो खुदा भी है।
-अकबर इलाहाबादी

1. अनवार - प्रकाशपुंज, जगमगाहट, रोशनियां('नूर’ का बहुबचन)
2. इलाही - ईश्वर, खुदा, मेरा ईश्वर, मेरा खुदा

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Desh Ratna's Collection of Munnawar rana Shayari "(बच्चे)"

(बच्चे)


फ़रिश्ते आ के उनके जिस्म पर ख़ुशबू लगाते हैं

वो बच्चे रेल के डिब्बे में जो झाड़ू लगाते हैं


हुमकते खेलते बच्चों की शैतानी नहीं जाती

मगर फिर भी हमारे घर की वीरानी नहीं जाती


अपने मुस्तक़्बिल की चादर पर रफ़ू करते हुए

मस्जिदों में देखिये बच्चे वज़ू करते हुए


मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं

मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ


घर का बोझ उठाने वाले बच्चे की तक़दीर न पूछ

बचपन घर से बाहर निकला और खिलौना टूट गया


जो अश्क गूँगे थे वो अर्ज़े—हाल करने लगे

हमारे बच्चे हमीं पर सवाल करने ल्गे


जब एक वाक़्या बचपन का हमको याद आया

हम उन परिंदों को फिर से घरों में छोड़ आए


भरे शहरों में क़ुर्बानी का मौसम जबसे आया है

मेरे बच्चे कभी होली में पिचकारी नहीं लाते


मस्जिद की चटाई पे ये सोते हुए बच्चे

इन बच्चों को देखो, कभी रेशम नहीं देखा


भूख से बेहाल बच्चे तो नहीं रोये मगर

घर का चूल्हा मुफ़लिसी की चुग़लियाँ खाने लगा

तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठ्ठी

उस शख़्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था


रेत पर खेलते बच्चों को अभी क्या मालूम

कोई सैलाब घरौंदा नहीं रहने देता


धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है

ख़ुशी से कौन बच्चा कारखाने तक पहुँचता है


मैं चाहूँ तो मिठाई की दुकानें खोल सकता हूँ

मगर बचपन हमेशा रामदाने तक पहुँचता है


हवा के रुख़ पे रहने दो ये जलना सीख जाएगा

कि बच्चा लड़खड़ाएगा तो चलना सीख जाएगा


इक सुलगते शहर में बच्चा मिला हँसता हुआ

सहमे—सहमे—से चराग़ों के उजाले की तरह


मैंने इक मुद्दत से मस्जिद नहीं देखी मगर

एक बच्चे का अज़ाँ देना बहुत अच्छा लगा


इन्हें अपनी ज़रूरत के ठिकाने याद रहते हैं

कहाँ पर है खिलौनों की दुकाँ बच्चे समझते हैं


ज़माना हो गया दंगे में इस घर को जले लेकिन

किसी बच्चे के रोने की सदाएँ रोज़ आती हैं

Monday, November 15, 2010

देश रत्न कि संग्रहिका... कुछ चुनिन्दा शेर.. इन्सानियत (Humanity)

कितने कांटों की बद्दुआ ली है
चन्द कलियों की जिन्दगी के लिए।
-शहीद फातिमी

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किसी चमन में बस इस खौफ से न गुजर हुआ,
किसी कली पै न भूले से पांव रख दूं।
-नदीम कासिमी

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कीजिए और कोई जुल्म अग जिद है यही,
लीजिए और मेरे लब पै दुआएं आई।
-जिगर मुरादाबादी

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कुछ और तो नहीं मेरे गरीब दामन में,
अगर कबूल हो तो जिन्दगी दे दूँ।

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जिस गम से तस्कीं मिलती हो, उस गम का मुदावा कौन करे,
जिस दर्द में लज्जत हो पिन्हा, उस दर्द का दरमाँ क्या होगा।
-जगन्नाथ आजाद

1.तस्कीं - (i) पीड़ा और दर्द में कमी, आराम (ii) संतोष, इत्मीनान 2.मुदावा - दवा,इलाज 3.लज्जत - आनन्द, लुत्फ 4.पिन्हा - छुपा हुआ 5.दरमाँ - उपचार, चिकित्सा, इलाज

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जो गमे-हबीब से दूर थे, वो खुद अपनी आग में जल गये,
जो गमे-हबीब को पा गये तो गमों से हंस के निकल गये।
-शायर लखनवी

1.गमे-हबीब – दोस्त या मित्र का ग़म


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तुम अपना रंजोगम अपनी परीशानी मुझे दे दो,
मुझे अपनी कसम, यह दुख, यह हैरानी मुझे दे दो।
मैं देखूं तो सही, यह दुनिया तुझे कैसे सतात है,
कोई दिन के लिये तुम अपनी निगहबानी मुझे दे दो।
ये माना मैं किसी काबिल नहीं इन निगाहों में,
बुरा क्या है अगर इस दिल की वीरानी मुझे दे दो।
-साहिर लुधियानवी

1. निगहबानी - देखरेख

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तेरी हमदर्द नजरों से मिला ऐसा सुकूं मुझको,
मैं ऐसा सुकूं मरकर भी शायद पा नहीं सकता।
-जाँनिसार अख्तर

1. हमदर्द - दुख-दर्द बांटने वाली या वाला

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दुश्मन भी हो तो दोस्ती से पेश आये हम,
बेगानगी से अपना नहीं आश्ना मिजाज।
-आतिश

1.बेगानगी - (i) परायापन (ii) अनजानापन, ज्ञान का न होना, बेइल्मी 2.आश्ना - परिचित, वाकिफ

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दूसरों पैं जब तबसिरा कीजिए,
सामने आइना रख लिया कीजिए।

1. तबसिरा - आलोचना

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मेरे गुनाहों पर करें तब्सिरा लेकिन,
सिर्फ मैं ही तो गुनहगार नहीं।
-सीमाब अकबराबादी

1.तब्सिरा - आलोचना

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बेचैनियाँ समेटकर सारे जहान की,
जब कुछ न बन सका तो मेरा दिल बना दिया।

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मैं परीशाँ था, परीशाँ हूँ, नई बात नहीं,
आज वो भी है परीशान, खुदा खैर करे।
-उमर अंसारी

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अंधेरे माँगने आये थे रौशनी की भीख,
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?

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अपना दर्दे-दिल समझने की यहाँ फुर्सत किसे,
हम तो औरों का तड़पना देखकर तड़पा किये।
-आनन्द नारायण 'मुल्ला'

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अपनी फिक्र न कुछ करेंप्रभू-प्रेम के दास,
सुई नंगी खुद रहे, सबके सिये लिबास।

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आदमीयत और शै है, इल्म है कुछ और चीज,
कितना तोते को रटाया, पर वह हैवां ही रहा।

1. हैवां - जानवर, पशु, चौपाया

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इलाही उनके हिस्से का भी गम मुझको अता कर दे,
कि उन मासूम आंखों में नमी देखी नहीं जाती।

1. अता - (i) प्रदान, दान (ii) पुरस्कार

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इश्क के रूतबे के आगे आस्मां भी पस्त है,
सर झुकाया है फरिश्तों ने बशर के सामने।
-'नसीम'

1.पस्त - (i) नीचा (ii) लघु, छोटा (iii) अधम, नीच,कमीना
2. बशर - मनुष्य, मानव, आदमी

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उनको इन्साँ मत समझ, हो सरकशी जिनमें 'जफर'
खाकसारी के लिये है खाक से इन्साँ बना।
-बहादुर शाह 'जफर'

1.सरकशी - (i) उद्दंडता, उज्जड़पन, अशिष्टता (ii) अवज्ञा, हुक्मउदूली (iii) विद्रोह, बगावत 2. खाकसारी - विनम्रता 3. खाक - (i) धूल, रज, गुबार, गर्द (ii)मिट्टी (iii) भूमि, जमीन




उम्मीदे सुलह क्या हो किसी हकपरस्त से,
पीछे वो क्या हटेगा जो हद से बढ़ा न हो।
-यगाना चंगेजी

1. हकपरस्त - सत्यनिष्ट, सत्य का पुजारी, धर्मात्मा

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एक दिल में गम जमाने भर का क्यो भर दिया,
खू-ए-हमदर्दी ने कूजे मे समन्दर भर दिया।

1.खू - स्वभाव, आदत, फितरत 2. कूजा - मिट्टी का सकोरा

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करूँ मैं दुश्मनी किससे कोई दुश्मन भी हो अपना,
मुहब्ब्त ने नहीं दिल में जगह छोड़ी अदावत की।

1.अदावत - दुश्मनी, शत्रुता

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कसरते-गम में लुत्फे-गमख्वारी, सागरे-मय का काम देती है,
वक्त पर इक लफ्जे-हमदर्दी, इब्ने-मरियम का काम देता है।
-अब्दुल हमीद 'अदम'

1.कसरत - प्राचुर्य, बाहुल्य, अधिकता 2. लुत्फ - (i)आनन्द, मजा (ii) करूणा, तरस (iii) दया, रहम, अनुकम्पा, मेहरबानी
3.सागरे-मय - शराब का याला 4.गमख्वारी – हमदर्दी
5.इब्ने-मरियम - मरियम का पुत्र हजरत ईसा, ईसा मसीह जो ईसाई धर्म के संस्थापक थे और जो फूंक से मुर्दों को जिला देते थे।

*****


कितने कांटों की बददुआ ली है,
चन्द कलियों की जिन्दगी के लिए।

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कितने हसीन लोग थे जो मिलकर एक बार,
आंखों में जज्ब हो गये, दिल में समा गये।
-अब्दुल हमीद 'अदम'

1.जज्ब - (i) आत्मसात, एक में समाया हुआ (ii) आकर्षण, कशिश

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किसी का रंज देखूँ यह नहीं होता मेरे दिल से,
नजर सैयाद कि झपके तो कुछ कह दूँ अनादिल से।

1.सैयाद - बहेलिया, चिड़िमार, आखेटक, शिकारी
2. अनादिल - अंदलीब का बहुवचन, बुलबुले

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किसी के काम न आए तो आदमी क्या है,
जो अपनी ही फिक्र में गुजरे वह जिन्दगी क्या है?
-'असर' लखनवी

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कुछ मेरे बाद और भी आयेंगे काफिले वाले,
कांटे यहाँ रास्ते से हटालूँ तो चैन लूं।
-'तसव्वर'

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कुछ लोगों से जब तक मुलाकात न हुई थी,
मैं भी यह समझा था, खुदा सबसे बड़ा है।

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कोई हद ही नहीं शायद मुहब्बत के फसाने की,
सुनाता जा रहा है, जिसको जितना याद होता है।

*****

खाकसारी का है गाफिल बहुत ऊँचा मर्तबा,
यह जमीं वह है जिसमें आसमां कोई नहीं।
-'अलम' मुजफ्फरनगरी

1.खाकसारी - विनम्रता 2.गाफिल - असावधान,बेखबर
3. मर्तबा - पद,दर्ज़ा

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खिज्रे-मंजिल से कम नहीं ऐ दोस्त,
एक हमदर्द अजनबी का खुलूस।
-रविश सिद्दकी

1.खिज्रे-मंजिल - राह दिखने वाला2. खुलूस - सच्चा प्यार

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खुद ही सरशारे-मये-उल्फत नहीं होना 'असर',
इससे भर-भर कर दिलों के जाम छलकाना भी है।
-'असर' लखनवी

1.सरशारे-मये-उल्फत - मोहब्बत की मदिरा से लबालब या परिपूर्ण

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खूने-दिल जाया न हो मुझको तो इतनी फिक्र है,
अपने काम आया तो क्या, गैरों के काम आया तो क्या?
-आनन्द नारायण 'मुल्ला'

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गुलों ने खारों के छेड़ने पर सिवा खामोशी के दम न मारा,
शरीफ उलझें अगर किसी से तो फिर शराफत कहाँ रहेगी।
-'शाद' अजीमाबादी

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घर से तो बहुत दूर है मंदिर का रास्ता,
आओ किसी रोते हुए चेहरे को हसाएं।

*****

'जफर' आदमी उसको न जानियेगा,
हो वो कैसा भी साहिबो-फहमो-जका।
जिसे ऐश में यादे-खुदा न रहा,
जिसे तैश में खौफे-खुदा न रहा।
-'जफर'.

1.साहिबो-फहमो-जका - बुद्धि और विवेक वाला, अत्यन्त बुद्धिमान
2. तैश - क्रोध, कोप, गुस्सा

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जब तक गमे-इन्साँ से 'जिगर' इन्साँ का दिल मामूर नहीं,
जन्नत ही सही दुनिया लेकिन जन्नत से जहन्नुम दूर नहीं।
-'जिगर' मुरादाबादी

1.मामूर - आबाद, भराहुआ, बसा हुआ 2. जन्नत - स्वर्ग, बहिश्त 3.जहन्नुम - नरक, दोजख, बहुत ही कष्ट और दुख की जगह

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तू जिसे जर्रा समझकर कर रहा है पायमाल,
देख उस जर्रे के सीने में कहीं दुनिया न हो।
-'शफा' ग्वालियरी

1. पायमाल - (i) पाँव तले रौंदा हुआ, पद-दलित(ii)दुर्दशाग्रस्त, मुसीबतजदा 2. जर्रा - (i) कण, बहुतहीबारीक रेज़ा (ii) अति तुच्छ, बहुत ही हकीर

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देश रत्न कि संग्रहिका... कुछ चुनिन्दा शेर.. हौसला (Perseverance)

हौसला (Perseverance)


अगर ऐ नाखुदा तूफान से लड़ने का दमखम है,
इधर कश्ती को मत लाना, इधर पानी बहुत कम है।

1. नाखुदा - मल्लाह, केवट, नाविक, कर्णधार
2. दमखम - शक्ति, हिम्मत, उत्साह, उमंग, हौसला

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अगर शोलाजन आशियाँ है तो क्या है,
बना लूँगा ऐसे, हजार आशियाँ मैं।
-निहाल सेहरारवी

1. शोलाजन - जलता हुआ, जिससे शोले निकल रहे हो
2. आशियाँ - घोसला, नीड़

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'अदम' इन्सान जब गहरी नजर डाले हवादिस पर,
तो इनमें बेहतरी के भी बहुत असबाब होते हैं।
-अब्दुल हमीद 'अदम'

1. हवादिस - दुर्घटनाओं 2. असबाब - सामान

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अपना जमाना आप बनाते हैं अहले-दिल,
हम वो नहीं है जिसको जमाना बना गया।
-'जिगर' मुरादाबाद

1. अहले-दिल - दिलवाले, साहसी, हिम्मती



अभी तो बहुत दूर है तुमको जाना,
है पुरपेच राहों से होकर गुजरना।
संभलकर है गिरना, है गिरकर संभलना,
कहाँ तक चलोगे किसी के सहारे।
-अफसर मेरठी

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अभी मरना बहुत दुश्वार है गम की कशाकश से,
अदा हो जायेगा यह फर्ज भी फुर्सत अगर होगी।
-नजर लखनवी

1. कशाकश - (i) खींचतान, खीचा-खींची, संघर्ष (ii) चढ़ा-ऊîपरी, स्पर्धा (iii) असमंजस

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अहले-हिम्मत ने हुसूले-मुद्दआ में जान दी,
और हम बैठे हुए रोया किये तकदीर को।
-असर लखनवी

1.अहले-हिम्मत - साहसी, हिम्मती 2. हुसूले-मुद्दआ - उद्देश्य की प्राप्ति

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आशियाँ फूंका है बिजली ने जहाँ सौ मर्तबा,
फिर उन्हीं शाखों पै, तरहे-आशियाँ रखता हूँ मैं।
-निहाल सेहरारवी

1. तरहे-आशियाँ - घोसले की नींव या बुनियाद



आहन नहीं कि चाहे जिधर मोड़ दीजिए,
शीशा हूँ मुड़ तो सकता नही, तोड़ दीजिए।
पत्थर तो रोज आते ही रहते हैं सहन में
हल इसका यह नहीं है कि घर छोड़ दीजिए।

1. आहन - लोहा, लौह 2. सहन - आंगन, अँगनाई

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इन्सान मुसीबत में हिम्मत न अगर हारे,
आसाँ से वह आसां है, मुश्किल से जो मुश्किल है।
-'सफी' लखनवी

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इब्तिदा में हर मुसीबत पर लरज जाता था दिल,
अब कोई गम इम्तिहाने-इश्क के काबिल नहीं।

1. इब्तिदा - शुरू, आरम्भ

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इरादे-कोहशिकन फौलाद जैसे दस्तोबाजू है,
मैं लंगर उठाने वाला हूँ तूफां को बता देना।

1.इरादे-कोहशिकन - पर्वत को तोड़ने वाला


इसी दुनिया की अक्सर तल्खियों में मुझको समझाया,
कि हिम्मत हो तो फिर है जहर भी इक चीज खाने की।
-'नैयर' अकबराबादी

1. तल्खियां- कटुता, कड़वाहट, अरूचिकर बातें

*****

इसी पै नाज घड़ी-दो-घड़ी जली होगी,
इसी पै शम्अ हमारी बराबरी होगी।
-'सफी' लखनवी

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उन्हीं को हम जहाँ में रहरवे-कामिल समझते हैं,
जो हस्ती को सफर और कब्र को मंजिल समझते हैं।
-बर्क

1. रहरव - पथिक, बटोही, मुसाफिर 2. कामिल - (i) निपुण, दक्ष, होशियार, चमत्कारी (ii) समूचा, सम्पूर्ण (iii) बिल्कुल, मुकम्मल, सर्वांगपूर्ण

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उन्हें सआदते-मंजिलरसी नसीब क्या होगी,
वह पाँव जो राहे-तलब में डगमगा न सके।
-जिगर मुरादाबादी

1. सआदत - प्रताप, तेज, इकबाल 2. मंजिलरसी - मंजिल
की प्राप्ति, मंजिल तक पहुंच 3. राहे-तलब - रास्ते की खोज


एक पत्थर की तकदीर भी संवर सकती है,
शर्त यह है कि उसे सलीके से संवारा जाए।

*****

एक मौज मचल जाए तो तूफां बन जाये,
एक फूल अगर चाहे तो गुलिस्तां बन जाये।
एक खून के कतरे में है तासीर इतनी
एक कौम की तारीख का उन्वान बन जाये।
-अब्दुल हमीद 'अदम'

1. तासीर - असर, प्रभाव 2. तारीख - इतिहास 3. उन्वान - विषय

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ऐ ताइरे-लाहूती, उस रिज्क से मौत अच्छी,
जिस रिज्क से आती हो,परवाज में कोताही।
-मोहम्मद इकबाल

1. ताइरे-लाहूती – आकाश में उड़ने वाला पंक्षी या
परिंदा 2. रिज्क - जीविका, रोजी, अन्न 3. परवाज - उड़ान
4. कोताही - (i) कमी ii) त्रुटि, खामी (iii) भूल

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ऐ देखने वाले साहिल से, मौजों से लिपट, तूफां से उलझ,
नज्जारा-ए-तूफां करने से, अन्दाजए-तूफां क्या होगा।

1. साहिल - किनारा, तट


कनाअत न कर आलमे-रंगो-बू पर,
चमन और भी, आशियां और भी है।
तू शाही है परवाज है काम तेरा,
तेरे सामने आसमां और भी है।
-मोहम्मद इकबाल

1. कनाअत - संतोष 2. आलम - जगत्, संसार, दुनिया 3. रंगो-बू - फूलों का रंग और उनका सुगंध (या दुनिया की रंगीनियाँ) 4. शाही - बाज पक्षी, श्येन 5.परवाज - उड़ान

*****

कनारों से मुझे ऐ नाखुदा तुम दूर ही रखना,
तहाँ लेकर चलो तूफां जहाँ से उठने वाला है।

1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार

*****

कफस में खींच ले जाए मुकद्दर या निशेमन में,
हमें परवाजे-मतलब है, हवा कोई भी चलती हो।
-सीमाब अकबराबादी

1. कफस - पिंजड़ा, कारागार 2. निशेमन - घोंसला, नीड़
3. परवाजे - उड़ान

*****

कभी मौत कहती है अलहजर, कभी दर्द कहता है रहम कर,
मैं वह राह चलता हूँ पुरखतर कि जहाँ फना का गुजर नहीं।
-असर लखनवी

1.अलहजर - बस करो, बचाओ 2. रहम - दया, कृपा, मेहरबानी, इनायत 3.पुरखतर - भीषण, भयानक, अत्यन्त खतनराक
4. फना - (i) मृत्यु, मौत (ii) विनाश, बर्बादी

*****


कमाले - बुजदिली है पस्त होना अपनी नजरों में,
अगर थोड़ी-सी हिम्मत हो तो फिर क्या हो नहीं सकता।
-चकबस्त लखनवी

1. कमाले–बुजदिली - अव्वल दर्जे की नासमझी या डरपोकपन, नादानी की चरमसीमा 2. पस्त - नीचा, हीन, छोटा

*****

कश्ती को भंवर में घिरने दो, मौजों के थपेड़े सहने दे,
जिन्दों में अगर जीना है तुम्हें, तूफान की हलचल रहने दे।
-सागर

*****

कहा था सबने डूबेगी यह कश्ती,
मगर हम जानकर बैठे उसी में।
-खलीक बीकानेरी

*****

कहो नाखुदा से उठा दे वह लंगर,
मैं तूफां की जिद देखना चाहता हूँ।

1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार


कारवां चलते हैं मंजिल का सहारा लेकर,
और मंजिल की कशिश रहनुमा होती है।

1. रहनुमा - मार्गदर्शक, पथप्रदर्शक, रास्ता दिखाने वाला

*****

किश्ती को तूफान से बचाना तो सहज है,
तूफान के वकार का दिल टूट जायेगा।
-नरेश कुमार 'शाद'

1. वकार - प्रतिष्ठा, इज्जत

*****

किस लिये शिकवा करें हम कातिबे-तकदीर का,
दिन बदल सकते है जब इन्सान के तदबीर से।

1. कातिबे-तकदीर - तकदीर लिखने वाला
2. तदबीर - (i) मेहनत, परिश्रम, प्रयत्न, कोशिश (ii) उपचार, इलाज

*****

कुछ और बढ़ाओ अब लो मशाल हिम्मत की,
मंजिल के करीब आकर बढ़ती है थकन यारों।



कुछ लोग हैं कि वक्त के साँचे में ढल गये,
कुछ लोग हैं कि वक्त के साँचे बदल गये।

*****

कुछ समझकर ही हुआ हूँ मौजे-दरिया का हरीफ,
वरना मैं भी जानता हूँ आफियत साहिल में है।
-वहशत कलकतवी

1.हरीफ – प्रतिद्वंद्वी, जिससे मुकाबला हो
2. आफियत - सुकून, सुख, चैन, आराम 3. साहिल - किनारा

*****

क्यों किसी रहबर से पुछूं अपनी मंजिल का पता,
मौजे-दरिया खुद लगा लेती है साहिल का पता।
-'आर्जू' लखनवी

1. रहबर - पथप्रदर्शक, रास्ता दिखाने वाला 2. साहिल - तट, किनारा

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खताओं पर खताएं हो रही थी नावकअफगन से,
इधर तीरों से बनता जा रहा था आशियाँ अपना।

1. खताओं - गलतियाँ 2. नावकअफगन - तीर चलाने वाला, तीरंदाज



खा-खा के शिकस्त फतह पाना सीखो
गिरदाब में कहकहा लगाना सीखो,
इसे दौरे –तलातुम में अगर जीना है
खुद अपने को तूफान बनाना सीखो।
-नजीर बनारसी

1. शिकस्त - पराजय, पराभव, हार 2. फतह - विजय, जीत, कामयाबी, सफलता 3. गिरदाब - भंवर, जलावर्त 4. दौरे–तलातुम - तूफानी दौर, पानी का मौजें मारना,बाढ़, तुग्यानी

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खाते रहे फरेब, संभलते रहे कदम,
चलते रहे जुनूं का सहारा लिये हुए।
-'शारक' मेरठी

1. जुनूं - उन्माद, पागलपन

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खिरदमंदों से क्या पुछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तिहा क्या है,
खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?
-मोहम्मद इकबाल

1.खिरदमंदों - बुद्धिमानों, अक्लमंदों 2. इब्तिदा - प्रारम्भ, आरम्भ, शुरूआत
3. इन्तिहा - अंत, आखिरी हद या छोर 4. रजा - इच्छा, तमन्ना, ख्वाहिश

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खुद यकीं होता नहीं जिनको अपनी मंजिल का,
उनको राह के पत्थर कभी रास्ता नहीं देते।

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