कितने कांटों की बद्दुआ ली है
चन्द कलियों की जिन्दगी के लिए।
-शहीद फातिमी
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किसी चमन में बस इस खौफ से न गुजर हुआ,
किसी कली पै न भूले से पांव रख दूं।
-नदीम कासिमी
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कीजिए और कोई जुल्म अग जिद है यही,
लीजिए और मेरे लब पै दुआएं आई।
-जिगर मुरादाबादी
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कुछ और तो नहीं मेरे गरीब दामन में,
अगर कबूल हो तो जिन्दगी दे दूँ।
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जिस गम से तस्कीं मिलती हो, उस गम का मुदावा कौन करे,
जिस दर्द में लज्जत हो पिन्हा, उस दर्द का दरमाँ क्या होगा।
-जगन्नाथ आजाद
1.तस्कीं - (i) पीड़ा और दर्द में कमी, आराम (ii) संतोष, इत्मीनान 2.मुदावा - दवा,इलाज 3.लज्जत - आनन्द, लुत्फ 4.पिन्हा - छुपा हुआ 5.दरमाँ - उपचार, चिकित्सा, इलाज
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जो गमे-हबीब से दूर थे, वो खुद अपनी आग में जल गये,
जो गमे-हबीब को पा गये तो गमों से हंस के निकल गये।
-शायर लखनवी
1.गमे-हबीब – दोस्त या मित्र का ग़म
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तुम अपना रंजोगम अपनी परीशानी मुझे दे दो,
मुझे अपनी कसम, यह दुख, यह हैरानी मुझे दे दो।
मैं देखूं तो सही, यह दुनिया तुझे कैसे सतात है,
कोई दिन के लिये तुम अपनी निगहबानी मुझे दे दो।
ये माना मैं किसी काबिल नहीं इन निगाहों में,
बुरा क्या है अगर इस दिल की वीरानी मुझे दे दो।
-साहिर लुधियानवी
1. निगहबानी - देखरेख
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तेरी हमदर्द नजरों से मिला ऐसा सुकूं मुझको,
मैं ऐसा सुकूं मरकर भी शायद पा नहीं सकता।
-जाँनिसार अख्तर
1. हमदर्द - दुख-दर्द बांटने वाली या वाला
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दुश्मन भी हो तो दोस्ती से पेश आये हम,
बेगानगी से अपना नहीं आश्ना मिजाज।
-आतिश
1.बेगानगी - (i) परायापन (ii) अनजानापन, ज्ञान का न होना, बेइल्मी 2.आश्ना - परिचित, वाकिफ
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दूसरों पैं जब तबसिरा कीजिए,
सामने आइना रख लिया कीजिए।
1. तबसिरा - आलोचना
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मेरे गुनाहों पर करें तब्सिरा लेकिन,
सिर्फ मैं ही तो गुनहगार नहीं।
-सीमाब अकबराबादी
1.तब्सिरा - आलोचना
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बेचैनियाँ समेटकर सारे जहान की,
जब कुछ न बन सका तो मेरा दिल बना दिया।
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मैं परीशाँ था, परीशाँ हूँ, नई बात नहीं,
आज वो भी है परीशान, खुदा खैर करे।
-उमर अंसारी
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अंधेरे माँगने आये थे रौशनी की भीख,
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?
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अपना दर्दे-दिल समझने की यहाँ फुर्सत किसे,
हम तो औरों का तड़पना देखकर तड़पा किये।
-आनन्द नारायण 'मुल्ला'
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अपनी फिक्र न कुछ करेंप्रभू-प्रेम के दास,
सुई नंगी खुद रहे, सबके सिये लिबास।
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आदमीयत और शै है, इल्म है कुछ और चीज,
कितना तोते को रटाया, पर वह हैवां ही रहा।
1. हैवां - जानवर, पशु, चौपाया
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इलाही उनके हिस्से का भी गम मुझको अता कर दे,
कि उन मासूम आंखों में नमी देखी नहीं जाती।
1. अता - (i) प्रदान, दान (ii) पुरस्कार
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इश्क के रूतबे के आगे आस्मां भी पस्त है,
सर झुकाया है फरिश्तों ने बशर के सामने।
-'नसीम'
1.पस्त - (i) नीचा (ii) लघु, छोटा (iii) अधम, नीच,कमीना
2. बशर - मनुष्य, मानव, आदमी
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उनको इन्साँ मत समझ, हो सरकशी जिनमें 'जफर'
खाकसारी के लिये है खाक से इन्साँ बना।
-बहादुर शाह 'जफर'
1.सरकशी - (i) उद्दंडता, उज्जड़पन, अशिष्टता (ii) अवज्ञा, हुक्मउदूली (iii) विद्रोह, बगावत 2. खाकसारी - विनम्रता 3. खाक - (i) धूल, रज, गुबार, गर्द (ii)मिट्टी (iii) भूमि, जमीन
उम्मीदे सुलह क्या हो किसी हकपरस्त से,
पीछे वो क्या हटेगा जो हद से बढ़ा न हो।
-यगाना चंगेजी
1. हकपरस्त - सत्यनिष्ट, सत्य का पुजारी, धर्मात्मा
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एक दिल में गम जमाने भर का क्यो भर दिया,
खू-ए-हमदर्दी ने कूजे मे समन्दर भर दिया।
1.खू - स्वभाव, आदत, फितरत 2. कूजा - मिट्टी का सकोरा
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करूँ मैं दुश्मनी किससे कोई दुश्मन भी हो अपना,
मुहब्ब्त ने नहीं दिल में जगह छोड़ी अदावत की।
1.अदावत - दुश्मनी, शत्रुता
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कसरते-गम में लुत्फे-गमख्वारी, सागरे-मय का काम देती है,
वक्त पर इक लफ्जे-हमदर्दी, इब्ने-मरियम का काम देता है।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.कसरत - प्राचुर्य, बाहुल्य, अधिकता 2. लुत्फ - (i)आनन्द, मजा (ii) करूणा, तरस (iii) दया, रहम, अनुकम्पा, मेहरबानी
3.सागरे-मय - शराब का याला 4.गमख्वारी – हमदर्दी
5.इब्ने-मरियम - मरियम का पुत्र हजरत ईसा, ईसा मसीह जो ईसाई धर्म के संस्थापक थे और जो फूंक से मुर्दों को जिला देते थे।
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कितने कांटों की बददुआ ली है,
चन्द कलियों की जिन्दगी के लिए।
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कितने हसीन लोग थे जो मिलकर एक बार,
आंखों में जज्ब हो गये, दिल में समा गये।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.जज्ब - (i) आत्मसात, एक में समाया हुआ (ii) आकर्षण, कशिश
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किसी का रंज देखूँ यह नहीं होता मेरे दिल से,
नजर सैयाद कि झपके तो कुछ कह दूँ अनादिल से।
1.सैयाद - बहेलिया, चिड़िमार, आखेटक, शिकारी
2. अनादिल - अंदलीब का बहुवचन, बुलबुले
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किसी के काम न आए तो आदमी क्या है,
जो अपनी ही फिक्र में गुजरे वह जिन्दगी क्या है?
-'असर' लखनवी
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कुछ मेरे बाद और भी आयेंगे काफिले वाले,
कांटे यहाँ रास्ते से हटालूँ तो चैन लूं।
-'तसव्वर'
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कुछ लोगों से जब तक मुलाकात न हुई थी,
मैं भी यह समझा था, खुदा सबसे बड़ा है।
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कोई हद ही नहीं शायद मुहब्बत के फसाने की,
सुनाता जा रहा है, जिसको जितना याद होता है।
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खाकसारी का है गाफिल बहुत ऊँचा मर्तबा,
यह जमीं वह है जिसमें आसमां कोई नहीं।
-'अलम' मुजफ्फरनगरी
1.खाकसारी - विनम्रता 2.गाफिल - असावधान,बेखबर
3. मर्तबा - पद,दर्ज़ा
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खिज्रे-मंजिल से कम नहीं ऐ दोस्त,
एक हमदर्द अजनबी का खुलूस।
-रविश सिद्दकी
1.खिज्रे-मंजिल - राह दिखने वाला2. खुलूस - सच्चा प्यार
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खुद ही सरशारे-मये-उल्फत नहीं होना 'असर',
इससे भर-भर कर दिलों के जाम छलकाना भी है।
-'असर' लखनवी
1.सरशारे-मये-उल्फत - मोहब्बत की मदिरा से लबालब या परिपूर्ण
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खूने-दिल जाया न हो मुझको तो इतनी फिक्र है,
अपने काम आया तो क्या, गैरों के काम आया तो क्या?
-आनन्द नारायण 'मुल्ला'
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गुलों ने खारों के छेड़ने पर सिवा खामोशी के दम न मारा,
शरीफ उलझें अगर किसी से तो फिर शराफत कहाँ रहेगी।
-'शाद' अजीमाबादी
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घर से तो बहुत दूर है मंदिर का रास्ता,
आओ किसी रोते हुए चेहरे को हसाएं।
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'जफर' आदमी उसको न जानियेगा,
हो वो कैसा भी साहिबो-फहमो-जका।
जिसे ऐश में यादे-खुदा न रहा,
जिसे तैश में खौफे-खुदा न रहा।
-'जफर'.
1.साहिबो-फहमो-जका - बुद्धि और विवेक वाला, अत्यन्त बुद्धिमान
2. तैश - क्रोध, कोप, गुस्सा
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जब तक गमे-इन्साँ से 'जिगर' इन्साँ का दिल मामूर नहीं,
जन्नत ही सही दुनिया लेकिन जन्नत से जहन्नुम दूर नहीं।
-'जिगर' मुरादाबादी
1.मामूर - आबाद, भराहुआ, बसा हुआ 2. जन्नत - स्वर्ग, बहिश्त 3.जहन्नुम - नरक, दोजख, बहुत ही कष्ट और दुख की जगह
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तू जिसे जर्रा समझकर कर रहा है पायमाल,
देख उस जर्रे के सीने में कहीं दुनिया न हो।
-'शफा' ग्वालियरी
1. पायमाल - (i) पाँव तले रौंदा हुआ, पद-दलित(ii)दुर्दशाग्रस्त, मुसीबतजदा 2. जर्रा - (i) कण, बहुतहीबारीक रेज़ा (ii) अति तुच्छ, बहुत ही हकीर
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Monday, November 15, 2010
देश रत्न कि संग्रहिका... कुछ चुनिन्दा शेर.. हौसला (Perseverance)
हौसला (Perseverance)
अगर ऐ नाखुदा तूफान से लड़ने का दमखम है,
इधर कश्ती को मत लाना, इधर पानी बहुत कम है।
1. नाखुदा - मल्लाह, केवट, नाविक, कर्णधार
2. दमखम - शक्ति, हिम्मत, उत्साह, उमंग, हौसला
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अगर शोलाजन आशियाँ है तो क्या है,
बना लूँगा ऐसे, हजार आशियाँ मैं।
-निहाल सेहरारवी
1. शोलाजन - जलता हुआ, जिससे शोले निकल रहे हो
2. आशियाँ - घोसला, नीड़
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'अदम' इन्सान जब गहरी नजर डाले हवादिस पर,
तो इनमें बेहतरी के भी बहुत असबाब होते हैं।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1. हवादिस - दुर्घटनाओं 2. असबाब - सामान
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अपना जमाना आप बनाते हैं अहले-दिल,
हम वो नहीं है जिसको जमाना बना गया।
-'जिगर' मुरादाबाद
1. अहले-दिल - दिलवाले, साहसी, हिम्मती
अभी तो बहुत दूर है तुमको जाना,
है पुरपेच राहों से होकर गुजरना।
संभलकर है गिरना, है गिरकर संभलना,
कहाँ तक चलोगे किसी के सहारे।
-अफसर मेरठी
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अभी मरना बहुत दुश्वार है गम की कशाकश से,
अदा हो जायेगा यह फर्ज भी फुर्सत अगर होगी।
-नजर लखनवी
1. कशाकश - (i) खींचतान, खीचा-खींची, संघर्ष (ii) चढ़ा-ऊîपरी, स्पर्धा (iii) असमंजस
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अहले-हिम्मत ने हुसूले-मुद्दआ में जान दी,
और हम बैठे हुए रोया किये तकदीर को।
-असर लखनवी
1.अहले-हिम्मत - साहसी, हिम्मती 2. हुसूले-मुद्दआ - उद्देश्य की प्राप्ति
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आशियाँ फूंका है बिजली ने जहाँ सौ मर्तबा,
फिर उन्हीं शाखों पै, तरहे-आशियाँ रखता हूँ मैं।
-निहाल सेहरारवी
1. तरहे-आशियाँ - घोसले की नींव या बुनियाद
आहन नहीं कि चाहे जिधर मोड़ दीजिए,
शीशा हूँ मुड़ तो सकता नही, तोड़ दीजिए।
पत्थर तो रोज आते ही रहते हैं सहन में
हल इसका यह नहीं है कि घर छोड़ दीजिए।
1. आहन - लोहा, लौह 2. सहन - आंगन, अँगनाई
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इन्सान मुसीबत में हिम्मत न अगर हारे,
आसाँ से वह आसां है, मुश्किल से जो मुश्किल है।
-'सफी' लखनवी
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इब्तिदा में हर मुसीबत पर लरज जाता था दिल,
अब कोई गम इम्तिहाने-इश्क के काबिल नहीं।
1. इब्तिदा - शुरू, आरम्भ
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इरादे-कोहशिकन फौलाद जैसे दस्तोबाजू है,
मैं लंगर उठाने वाला हूँ तूफां को बता देना।
1.इरादे-कोहशिकन - पर्वत को तोड़ने वाला
इसी दुनिया की अक्सर तल्खियों में मुझको समझाया,
कि हिम्मत हो तो फिर है जहर भी इक चीज खाने की।
-'नैयर' अकबराबादी
1. तल्खियां- कटुता, कड़वाहट, अरूचिकर बातें
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इसी पै नाज घड़ी-दो-घड़ी जली होगी,
इसी पै शम्अ हमारी बराबरी होगी।
-'सफी' लखनवी
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उन्हीं को हम जहाँ में रहरवे-कामिल समझते हैं,
जो हस्ती को सफर और कब्र को मंजिल समझते हैं।
-बर्क
1. रहरव - पथिक, बटोही, मुसाफिर 2. कामिल - (i) निपुण, दक्ष, होशियार, चमत्कारी (ii) समूचा, सम्पूर्ण (iii) बिल्कुल, मुकम्मल, सर्वांगपूर्ण
*****
उन्हें सआदते-मंजिलरसी नसीब क्या होगी,
वह पाँव जो राहे-तलब में डगमगा न सके।
-जिगर मुरादाबादी
1. सआदत - प्रताप, तेज, इकबाल 2. मंजिलरसी - मंजिल
की प्राप्ति, मंजिल तक पहुंच 3. राहे-तलब - रास्ते की खोज
एक पत्थर की तकदीर भी संवर सकती है,
शर्त यह है कि उसे सलीके से संवारा जाए।
*****
एक मौज मचल जाए तो तूफां बन जाये,
एक फूल अगर चाहे तो गुलिस्तां बन जाये।
एक खून के कतरे में है तासीर इतनी
एक कौम की तारीख का उन्वान बन जाये।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1. तासीर - असर, प्रभाव 2. तारीख - इतिहास 3. उन्वान - विषय
*****
ऐ ताइरे-लाहूती, उस रिज्क से मौत अच्छी,
जिस रिज्क से आती हो,परवाज में कोताही।
-मोहम्मद इकबाल
1. ताइरे-लाहूती – आकाश में उड़ने वाला पंक्षी या
परिंदा 2. रिज्क - जीविका, रोजी, अन्न 3. परवाज - उड़ान
4. कोताही - (i) कमी ii) त्रुटि, खामी (iii) भूल
*****
ऐ देखने वाले साहिल से, मौजों से लिपट, तूफां से उलझ,
नज्जारा-ए-तूफां करने से, अन्दाजए-तूफां क्या होगा।
1. साहिल - किनारा, तट
कनाअत न कर आलमे-रंगो-बू पर,
चमन और भी, आशियां और भी है।
तू शाही है परवाज है काम तेरा,
तेरे सामने आसमां और भी है।
-मोहम्मद इकबाल
1. कनाअत - संतोष 2. आलम - जगत्, संसार, दुनिया 3. रंगो-बू - फूलों का रंग और उनका सुगंध (या दुनिया की रंगीनियाँ) 4. शाही - बाज पक्षी, श्येन 5.परवाज - उड़ान
*****
कनारों से मुझे ऐ नाखुदा तुम दूर ही रखना,
तहाँ लेकर चलो तूफां जहाँ से उठने वाला है।
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
*****
कफस में खींच ले जाए मुकद्दर या निशेमन में,
हमें परवाजे-मतलब है, हवा कोई भी चलती हो।
-सीमाब अकबराबादी
1. कफस - पिंजड़ा, कारागार 2. निशेमन - घोंसला, नीड़
3. परवाजे - उड़ान
*****
कभी मौत कहती है अलहजर, कभी दर्द कहता है रहम कर,
मैं वह राह चलता हूँ पुरखतर कि जहाँ फना का गुजर नहीं।
-असर लखनवी
1.अलहजर - बस करो, बचाओ 2. रहम - दया, कृपा, मेहरबानी, इनायत 3.पुरखतर - भीषण, भयानक, अत्यन्त खतनराक
4. फना - (i) मृत्यु, मौत (ii) विनाश, बर्बादी
*****
कमाले - बुजदिली है पस्त होना अपनी नजरों में,
अगर थोड़ी-सी हिम्मत हो तो फिर क्या हो नहीं सकता।
-चकबस्त लखनवी
1. कमाले–बुजदिली - अव्वल दर्जे की नासमझी या डरपोकपन, नादानी की चरमसीमा 2. पस्त - नीचा, हीन, छोटा
*****
कश्ती को भंवर में घिरने दो, मौजों के थपेड़े सहने दे,
जिन्दों में अगर जीना है तुम्हें, तूफान की हलचल रहने दे।
-सागर
*****
कहा था सबने डूबेगी यह कश्ती,
मगर हम जानकर बैठे उसी में।
-खलीक बीकानेरी
*****
कहो नाखुदा से उठा दे वह लंगर,
मैं तूफां की जिद देखना चाहता हूँ।
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
कारवां चलते हैं मंजिल का सहारा लेकर,
और मंजिल की कशिश रहनुमा होती है।
1. रहनुमा - मार्गदर्शक, पथप्रदर्शक, रास्ता दिखाने वाला
*****
किश्ती को तूफान से बचाना तो सहज है,
तूफान के वकार का दिल टूट जायेगा।
-नरेश कुमार 'शाद'
1. वकार - प्रतिष्ठा, इज्जत
*****
किस लिये शिकवा करें हम कातिबे-तकदीर का,
दिन बदल सकते है जब इन्सान के तदबीर से।
1. कातिबे-तकदीर - तकदीर लिखने वाला
2. तदबीर - (i) मेहनत, परिश्रम, प्रयत्न, कोशिश (ii) उपचार, इलाज
*****
कुछ और बढ़ाओ अब लो मशाल हिम्मत की,
मंजिल के करीब आकर बढ़ती है थकन यारों।
कुछ लोग हैं कि वक्त के साँचे में ढल गये,
कुछ लोग हैं कि वक्त के साँचे बदल गये।
*****
कुछ समझकर ही हुआ हूँ मौजे-दरिया का हरीफ,
वरना मैं भी जानता हूँ आफियत साहिल में है।
-वहशत कलकतवी
1.हरीफ – प्रतिद्वंद्वी, जिससे मुकाबला हो
2. आफियत - सुकून, सुख, चैन, आराम 3. साहिल - किनारा
*****
क्यों किसी रहबर से पुछूं अपनी मंजिल का पता,
मौजे-दरिया खुद लगा लेती है साहिल का पता।
-'आर्जू' लखनवी
1. रहबर - पथप्रदर्शक, रास्ता दिखाने वाला 2. साहिल - तट, किनारा
*****
खताओं पर खताएं हो रही थी नावकअफगन से,
इधर तीरों से बनता जा रहा था आशियाँ अपना।
1. खताओं - गलतियाँ 2. नावकअफगन - तीर चलाने वाला, तीरंदाज
खा-खा के शिकस्त फतह पाना सीखो
गिरदाब में कहकहा लगाना सीखो,
इसे दौरे –तलातुम में अगर जीना है
खुद अपने को तूफान बनाना सीखो।
-नजीर बनारसी
1. शिकस्त - पराजय, पराभव, हार 2. फतह - विजय, जीत, कामयाबी, सफलता 3. गिरदाब - भंवर, जलावर्त 4. दौरे–तलातुम - तूफानी दौर, पानी का मौजें मारना,बाढ़, तुग्यानी
*****
खाते रहे फरेब, संभलते रहे कदम,
चलते रहे जुनूं का सहारा लिये हुए।
-'शारक' मेरठी
1. जुनूं - उन्माद, पागलपन
*****
खिरदमंदों से क्या पुछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तिहा क्या है,
खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?
-मोहम्मद इकबाल
1.खिरदमंदों - बुद्धिमानों, अक्लमंदों 2. इब्तिदा - प्रारम्भ, आरम्भ, शुरूआत
3. इन्तिहा - अंत, आखिरी हद या छोर 4. रजा - इच्छा, तमन्ना, ख्वाहिश
*****
खुद यकीं होता नहीं जिनको अपनी मंजिल का,
उनको राह के पत्थर कभी रास्ता नहीं देते।
*****
अगर ऐ नाखुदा तूफान से लड़ने का दमखम है,
इधर कश्ती को मत लाना, इधर पानी बहुत कम है।
1. नाखुदा - मल्लाह, केवट, नाविक, कर्णधार
2. दमखम - शक्ति, हिम्मत, उत्साह, उमंग, हौसला
*****
अगर शोलाजन आशियाँ है तो क्या है,
बना लूँगा ऐसे, हजार आशियाँ मैं।
-निहाल सेहरारवी
1. शोलाजन - जलता हुआ, जिससे शोले निकल रहे हो
2. आशियाँ - घोसला, नीड़
*****
'अदम' इन्सान जब गहरी नजर डाले हवादिस पर,
तो इनमें बेहतरी के भी बहुत असबाब होते हैं।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1. हवादिस - दुर्घटनाओं 2. असबाब - सामान
*****
अपना जमाना आप बनाते हैं अहले-दिल,
हम वो नहीं है जिसको जमाना बना गया।
-'जिगर' मुरादाबाद
1. अहले-दिल - दिलवाले, साहसी, हिम्मती
अभी तो बहुत दूर है तुमको जाना,
है पुरपेच राहों से होकर गुजरना।
संभलकर है गिरना, है गिरकर संभलना,
कहाँ तक चलोगे किसी के सहारे।
-अफसर मेरठी
*****
अभी मरना बहुत दुश्वार है गम की कशाकश से,
अदा हो जायेगा यह फर्ज भी फुर्सत अगर होगी।
-नजर लखनवी
1. कशाकश - (i) खींचतान, खीचा-खींची, संघर्ष (ii) चढ़ा-ऊîपरी, स्पर्धा (iii) असमंजस
*****
अहले-हिम्मत ने हुसूले-मुद्दआ में जान दी,
और हम बैठे हुए रोया किये तकदीर को।
-असर लखनवी
1.अहले-हिम्मत - साहसी, हिम्मती 2. हुसूले-मुद्दआ - उद्देश्य की प्राप्ति
*****
आशियाँ फूंका है बिजली ने जहाँ सौ मर्तबा,
फिर उन्हीं शाखों पै, तरहे-आशियाँ रखता हूँ मैं।
-निहाल सेहरारवी
1. तरहे-आशियाँ - घोसले की नींव या बुनियाद
आहन नहीं कि चाहे जिधर मोड़ दीजिए,
शीशा हूँ मुड़ तो सकता नही, तोड़ दीजिए।
पत्थर तो रोज आते ही रहते हैं सहन में
हल इसका यह नहीं है कि घर छोड़ दीजिए।
1. आहन - लोहा, लौह 2. सहन - आंगन, अँगनाई
*****
इन्सान मुसीबत में हिम्मत न अगर हारे,
आसाँ से वह आसां है, मुश्किल से जो मुश्किल है।
-'सफी' लखनवी
*****
इब्तिदा में हर मुसीबत पर लरज जाता था दिल,
अब कोई गम इम्तिहाने-इश्क के काबिल नहीं।
1. इब्तिदा - शुरू, आरम्भ
*****
इरादे-कोहशिकन फौलाद जैसे दस्तोबाजू है,
मैं लंगर उठाने वाला हूँ तूफां को बता देना।
1.इरादे-कोहशिकन - पर्वत को तोड़ने वाला
इसी दुनिया की अक्सर तल्खियों में मुझको समझाया,
कि हिम्मत हो तो फिर है जहर भी इक चीज खाने की।
-'नैयर' अकबराबादी
1. तल्खियां- कटुता, कड़वाहट, अरूचिकर बातें
*****
इसी पै नाज घड़ी-दो-घड़ी जली होगी,
इसी पै शम्अ हमारी बराबरी होगी।
-'सफी' लखनवी
*****
उन्हीं को हम जहाँ में रहरवे-कामिल समझते हैं,
जो हस्ती को सफर और कब्र को मंजिल समझते हैं।
-बर्क
1. रहरव - पथिक, बटोही, मुसाफिर 2. कामिल - (i) निपुण, दक्ष, होशियार, चमत्कारी (ii) समूचा, सम्पूर्ण (iii) बिल्कुल, मुकम्मल, सर्वांगपूर्ण
*****
उन्हें सआदते-मंजिलरसी नसीब क्या होगी,
वह पाँव जो राहे-तलब में डगमगा न सके।
-जिगर मुरादाबादी
1. सआदत - प्रताप, तेज, इकबाल 2. मंजिलरसी - मंजिल
की प्राप्ति, मंजिल तक पहुंच 3. राहे-तलब - रास्ते की खोज
एक पत्थर की तकदीर भी संवर सकती है,
शर्त यह है कि उसे सलीके से संवारा जाए।
*****
एक मौज मचल जाए तो तूफां बन जाये,
एक फूल अगर चाहे तो गुलिस्तां बन जाये।
एक खून के कतरे में है तासीर इतनी
एक कौम की तारीख का उन्वान बन जाये।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1. तासीर - असर, प्रभाव 2. तारीख - इतिहास 3. उन्वान - विषय
*****
ऐ ताइरे-लाहूती, उस रिज्क से मौत अच्छी,
जिस रिज्क से आती हो,परवाज में कोताही।
-मोहम्मद इकबाल
1. ताइरे-लाहूती – आकाश में उड़ने वाला पंक्षी या
परिंदा 2. रिज्क - जीविका, रोजी, अन्न 3. परवाज - उड़ान
4. कोताही - (i) कमी ii) त्रुटि, खामी (iii) भूल
*****
ऐ देखने वाले साहिल से, मौजों से लिपट, तूफां से उलझ,
नज्जारा-ए-तूफां करने से, अन्दाजए-तूफां क्या होगा।
1. साहिल - किनारा, तट
कनाअत न कर आलमे-रंगो-बू पर,
चमन और भी, आशियां और भी है।
तू शाही है परवाज है काम तेरा,
तेरे सामने आसमां और भी है।
-मोहम्मद इकबाल
1. कनाअत - संतोष 2. आलम - जगत्, संसार, दुनिया 3. रंगो-बू - फूलों का रंग और उनका सुगंध (या दुनिया की रंगीनियाँ) 4. शाही - बाज पक्षी, श्येन 5.परवाज - उड़ान
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कनारों से मुझे ऐ नाखुदा तुम दूर ही रखना,
तहाँ लेकर चलो तूफां जहाँ से उठने वाला है।
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
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कफस में खींच ले जाए मुकद्दर या निशेमन में,
हमें परवाजे-मतलब है, हवा कोई भी चलती हो।
-सीमाब अकबराबादी
1. कफस - पिंजड़ा, कारागार 2. निशेमन - घोंसला, नीड़
3. परवाजे - उड़ान
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कभी मौत कहती है अलहजर, कभी दर्द कहता है रहम कर,
मैं वह राह चलता हूँ पुरखतर कि जहाँ फना का गुजर नहीं।
-असर लखनवी
1.अलहजर - बस करो, बचाओ 2. रहम - दया, कृपा, मेहरबानी, इनायत 3.पुरखतर - भीषण, भयानक, अत्यन्त खतनराक
4. फना - (i) मृत्यु, मौत (ii) विनाश, बर्बादी
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कमाले - बुजदिली है पस्त होना अपनी नजरों में,
अगर थोड़ी-सी हिम्मत हो तो फिर क्या हो नहीं सकता।
-चकबस्त लखनवी
1. कमाले–बुजदिली - अव्वल दर्जे की नासमझी या डरपोकपन, नादानी की चरमसीमा 2. पस्त - नीचा, हीन, छोटा
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कश्ती को भंवर में घिरने दो, मौजों के थपेड़े सहने दे,
जिन्दों में अगर जीना है तुम्हें, तूफान की हलचल रहने दे।
-सागर
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कहा था सबने डूबेगी यह कश्ती,
मगर हम जानकर बैठे उसी में।
-खलीक बीकानेरी
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कहो नाखुदा से उठा दे वह लंगर,
मैं तूफां की जिद देखना चाहता हूँ।
1. नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार
कारवां चलते हैं मंजिल का सहारा लेकर,
और मंजिल की कशिश रहनुमा होती है।
1. रहनुमा - मार्गदर्शक, पथप्रदर्शक, रास्ता दिखाने वाला
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किश्ती को तूफान से बचाना तो सहज है,
तूफान के वकार का दिल टूट जायेगा।
-नरेश कुमार 'शाद'
1. वकार - प्रतिष्ठा, इज्जत
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किस लिये शिकवा करें हम कातिबे-तकदीर का,
दिन बदल सकते है जब इन्सान के तदबीर से।
1. कातिबे-तकदीर - तकदीर लिखने वाला
2. तदबीर - (i) मेहनत, परिश्रम, प्रयत्न, कोशिश (ii) उपचार, इलाज
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कुछ और बढ़ाओ अब लो मशाल हिम्मत की,
मंजिल के करीब आकर बढ़ती है थकन यारों।
कुछ लोग हैं कि वक्त के साँचे में ढल गये,
कुछ लोग हैं कि वक्त के साँचे बदल गये।
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कुछ समझकर ही हुआ हूँ मौजे-दरिया का हरीफ,
वरना मैं भी जानता हूँ आफियत साहिल में है।
-वहशत कलकतवी
1.हरीफ – प्रतिद्वंद्वी, जिससे मुकाबला हो
2. आफियत - सुकून, सुख, चैन, आराम 3. साहिल - किनारा
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क्यों किसी रहबर से पुछूं अपनी मंजिल का पता,
मौजे-दरिया खुद लगा लेती है साहिल का पता।
-'आर्जू' लखनवी
1. रहबर - पथप्रदर्शक, रास्ता दिखाने वाला 2. साहिल - तट, किनारा
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खताओं पर खताएं हो रही थी नावकअफगन से,
इधर तीरों से बनता जा रहा था आशियाँ अपना।
1. खताओं - गलतियाँ 2. नावकअफगन - तीर चलाने वाला, तीरंदाज
खा-खा के शिकस्त फतह पाना सीखो
गिरदाब में कहकहा लगाना सीखो,
इसे दौरे –तलातुम में अगर जीना है
खुद अपने को तूफान बनाना सीखो।
-नजीर बनारसी
1. शिकस्त - पराजय, पराभव, हार 2. फतह - विजय, जीत, कामयाबी, सफलता 3. गिरदाब - भंवर, जलावर्त 4. दौरे–तलातुम - तूफानी दौर, पानी का मौजें मारना,बाढ़, तुग्यानी
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खाते रहे फरेब, संभलते रहे कदम,
चलते रहे जुनूं का सहारा लिये हुए।
-'शारक' मेरठी
1. जुनूं - उन्माद, पागलपन
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खिरदमंदों से क्या पुछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तिहा क्या है,
खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?
-मोहम्मद इकबाल
1.खिरदमंदों - बुद्धिमानों, अक्लमंदों 2. इब्तिदा - प्रारम्भ, आरम्भ, शुरूआत
3. इन्तिहा - अंत, आखिरी हद या छोर 4. रजा - इच्छा, तमन्ना, ख्वाहिश
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खुद यकीं होता नहीं जिनको अपनी मंजिल का,
उनको राह के पत्थर कभी रास्ता नहीं देते।
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Sunday, October 24, 2010
माँ -- शायरी --- देश रत्न की संग्राहिका से
ज़रा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए
दीए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है।
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हँसते हुए माँ बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते
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हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
सगी है या कि सौतेली है माँ बच्चे समझते हैं
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हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह
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सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’
रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते
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सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
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मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है
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मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना
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भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े
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लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
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तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा
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इस चेहरे में पोशीदा है इक क़ौम का चेहरा
चेहरे का उतर जाना मुनासिब नहीं होगा
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अब भी चलती है जब आँधी कभी ग़म की ‘राना’
माँ की ममता मुझे बाहों में छुपा लेती है
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मुसीबत के दिनों में हमेशा साथ रहती है
पयम्बर क्या परेशानी में उम्मत छोड़ सकता है
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जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा
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देख ले ज़ालिम शिकारी ! माँ की ममता देख ले
देख ले चिड़िया तेरे दाने तलक तो आ गई
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मुझे भी उसकी जदाई सताती रहती है
उसे भी ख़्वाब में बेटा दिखाई देता है
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मुफ़लिसी घर में ठहरने नहीं देती उसको
और परदेस में बेटा नहीं रहने देता
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अगर स्कूल में बच्चे हों घर अच्छा नहीं लगता
परिन्दों के न होने पर शजर अच्छा नहीं लगता
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गले मिलने को आपस में दुआयें रोज़ आती हैं
अभी मस्जिद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
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कभी —कभी मुझे यूँ भी अज़ाँ बुलाती है
शरीर बच्चे को जिस तरह माँ बुलाती है
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किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
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ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
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इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
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मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
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मेरा खुलूस तो पूरब के गाँव जैसा है
सुलूक दुनिया का सौतेली माओं जैसा है
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रौशनी देती हुई सब लालटेनें बुझ गईं
ख़त नहीं आया जो बेटों का तो माएँ बुझ गईं
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वो मैला—सा बोसीदा—सा आँचल नहीं देखा
बरसों हुए हमने कोई पीपल नहीं देखा
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कई बातें मुहब्बत सबको बुनियादी बताती है
जो परदादी बताती थी वही दादी बताती है
हादसों की गर्द से ख़ुद को बचाने के लिए
माँ ! हम अपने साथ बस तेरी दुआ ले जायेंगे
हवा उड़ाए लिए जा रही है हर चादर
पुराने लोग सभी इन्तेक़ाल करने लगे
ऐ ख़ुदा ! फूल —से बच्चों की हिफ़ाज़त करना
मुफ़लिसी चाह रही है मेरे घर में रहना
हमें हरीफ़ों की तादाद क्यों बताते हो
हमारे साथ भी बेटा जवान रहता है
ख़ुद को इस भीड़ में तन्हा नहीं होने देंगे
माँ तुझे हम अभी बूढ़ा नहीं होने देंगे
जब भी देखा मेरे किरदार पे धब्बा कोई
देर तक बैठ के तन्हाई में रोया कोई
ख़ुदा करे कि उम्मीदों के हाथ पीले हों
अभी तलक तो गुज़ारी है इद्दतों की तरह
घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है
यहीं रहूँगा कहीं उम्र भर न जाउँगा
ज़मीन माँ है इसे छोड़ कर न जाऊँगा
स्टेशन से वापस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं
पत्ते देहाती रहते हैं फल शहरी हो जाते हैं
अब देखिये कौम आए जनाज़े को उठाने
यूँ तार तो मेरे सभी बेटों को मिलेगा
अब अँधेरा मुस्तक़िल रहता है इस दहलीज़ पर
जो हमारी मुन्तज़िर रहती थीं आँखें बुझ गईं
अगर किसी की दुआ में असर नहीं होता
तो मेरे पास से क्यों तीर आ के लौट गया
अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
कहीं बे्नूर न हो जायें वो बूढ़ी आँखें
घर में डरते थे ख़बर भी मेरे भाई देते
क्या जाने कहाँ होते मेरे फूल-से बच्चे
विरसे में अगर माँ की दुआ भी नहीं मिलती
कुछ नहीं होगा तो आँचल में छुपा लेगी मुझे
माँ कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी
क़दमों में ला के डाल दीं सब नेमतें मगर
सौतेली माँ को बच्चे से नफ़रत वही रही
धँसती हुई क़ब्रों की तरफ़ देख लिया था
माँ बाप के चेहरों मी तरफ़ देख लिया था
कोई दुखी हो कभी कहना नहीं पड़ता उससे
वो ज़रूरत को तलबगार से पहचानता है
किसी को देख कर रोते हुए हँसना नहीं अच्छा
ये वो आँसू हैं जिनसे तख़्ते—सुल्तानी पलटता है
दिन भर की मशक़्क़त से बदन चूर है लेकिन
माँ ने मुझे देखा तो थकन भूल गई है
दुआएँ माँ की पहुँचाने को मीलों मील जाती हैं
कि जब परदेस जाने के लिए बेटा निकलता है
दिया है माँ ने मुझे दूध भी वज़ू करके
महाज़े-जंग से मैं लौट कर न जाऊँगा
खिलौनों की तरफ़ बच्चे को माँ जाने नहीं देती
मगर आगे खिलौनों की दुकाँ जाने नहीं देती
दिखाते हैं पड़ोसी मुल्क आँखें तो दिखाने दो
कहीं बच्चों के बोसे से भी माँ का गाल कटता है
बहन का प्यार माँ की मामता दो चीखती आँखें
यही तोहफ़े थे वो जिनको मैं अक्सर याद करता था
बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है
बड़ी बेचारगी से लौटती बारात तकते हैं
बहादुर हो के भी मजबूर होते हैं दुल्हन वाले
खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से
बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही
मेरा बचपन था मेरा घर था खिलौने थे मेरे
सर पे माँ बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था
मुक़द्दस मुस्कुराहट माँ के होंठों पर लरज़ती है
किसी बच्चे का जब पहला सिपारा ख़त्म होता है
मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ
जिसके माँ बाप को रोते हुए मर जाना है
मिलता—जुलता हैं सभी माँओं से माँ का चेहरा
गुरूद्वारे की भी दीवार न गिरने पाये
मैंने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़—ए—माँ रहने दिया
घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गईं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गईं
मैदान छोड़ देने स्र मैं बच तो जाऊँगा
लेकिन जो ये ख़बर मेरी माँ तक पहुँच गई
‘मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती
मिट्टी लिपट—लिपट गई पैरों से इसलिए
तैयार हो के भी कभी हिजरत न कर सके
मुफ़्लिसी ! बच्चे को रोने नहीं देना वरना
एक आँसू भरे बाज़ार को खा जाएगा
मुझे खबर नहीम जन्नत बड़ी कि माँ लेकिन
लोग कहते हैं कि जन्नत बशर के नीचे है
मुझे कढ़े हुए तकिये की क्या ज़रूरत है
किसी का हाथ अभी मेरे सर के नीचे है
बुज़ुर्गों का मेरे दिल से अभी तक डर नहीं जाता
कि जब तक जागती रहती है माँ मैं घर नहीं जाता
मोहब्बत करते जाओ बस यही सच्ची इबादत है
मोहब्बत माँ को भी मक्का—मदीना मान लेती है
माँ ये कहती थी कि मोती हैं हमारे आँसू
इसलिए अश्कों का का पीना भी बुरा लगता है
परदेस जाने वाले कभी लौट आयेंगे
लेकिन इस इंतज़ार में आँखें चली गईं
शहर के रस्ते हों चाहे गाँव की पगडंडियाँ
माँ की उँगली थाम कर चलना मुझे अच्छा लगा
मैं कोई अहसान एहसान मानूँ भी तो आख़िर किसलिए
शहर ने दौलत अगर दी है तो बेटा ले लिया
अब भी रौशन हैं तेरी याद से घर के कमरे
रौशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको
मेरे चेहरे पे ममता की फ़रावानी चमकती है
मैं बूढ़ा हो रहा हूँ फिर भी पेशानी चमकती है
वो जा रहा है घर से जनाज़ा बुज़ुर्ग का
आँगन में इक दरख़्त पुराना नहीं रहा
वो तो लिखा के लाई है क़िस्मत में जागना
माँ कैसे सो सकेगी कि बेटा सफ़र में है
३९.
शाहज़ादे को ये मालूम नहीं है शायद
माँ नहीं जानती दस्तार का बोसा लेना
आँखों से माँगने लगे पानी वज़ू का हम
काग़ज़ पे जब भी देख किया माँ लिखा हुआ
अभी तो मेरी ज़रूरत है मेरे बच्चों को
बड़े हुए तो ये ख़ुद इन्त्ज़ाम कर लेंगे
मैं हूँ मेरा बच्चा है खिलौनों की दुकाँ है
अब कोई मेरे पास बहाना भी नहीं है
ऐ ख़ुदा ! तू फ़ीस के पैसे अता कर दे मुझे
मेरे बच्चों को भी यूनिवर्सिटी अच्छी लगी
भीख से तो भूख अच्छी गाँव को वापस चलो
शहर में रहने से ये बच्चा बुरा हो जाएगा
खिलौनों के लिए बच्चे अभी तक जागते होंगे
तुझे ऐ मुफ़्लिसी कोई बहाना ढूँढ लेना है
ममता की आबरू को बचाया है नींद ने
बच्चा ज़मीं पे सो भी गया खेलते हुए
मेरे बच्चे नामुरादी में जवाँ भी हो गये
मेरी ख़्वाहिश सिर्फ़ बाज़ारों को तकती रह गई
बच्चों की फ़ीस, उनकी किताबें, क़लम, दवात
मेरी ग़रीब आँखों में स्कूल चुभ गया
वो समझते ही नहीं हैं मेरी मजबूरी को
इसलिए बच्चों पे ग़ुस्सा भी नहीं आता है
किसी भी रंग को पहचानना मुश्किल नहीं होता
मेरे बच्चे की सूरत देख इसको ज़र्द कहते हैं
धूप से मिल गये हैं पेड़ हमारे घर के
मैं समझती थी कि काम आएगा बेटा अपना
फिर उसको मर के भी ख़ुद से जुदा होने नहीं देती
यह मिट्टी जब किसी को अपना बेटा मान लेती है
तमाम उम्र सलामत रहें दुआ है मेरी
हमारे सर पे हैं जो हाथ बरकतों वाले
हमारी मुफ़्लिसी हमको इजाज़त तो नहीं देती
मगर हम तेरी ख़ातिर कोई शहज़ादा भी देखेंगे
माँ—बाप की बूढ़ी आँखों में इक फ़िक़्र—सी छाई रहती है
जिस कम्बल में सब सोते थे अब वो भी छोटा पड़ता है
दोस्ती दुश्मनी दोनों शामिल रहीं दोस्तों की नवाज़िश थी कुछ इस तरह
काट ले शोख़ बच्चा कोई जिस तरह माँ के रुख़सार पर प्यार करते हुए
माँ की ममता घने बादलों की तरह सर पे साया किए साथ चलती रही
एक बच्चा किताबें लिए हाथ में ख़ामुशी से सड़क पार करते हुए
दुख बुज़ुर्गों ने काफ़ी उठाए मगर मेरा बचपन बहुत ही सुहाना रहा
उम्र भर धूप में पेड़ जलते रहे अपनी शाख़ें समरदार करते हुए
चलो माना कि शहनाई मसर्रत की निशानी है
मगर वो शख़्स जिसकी आ के बेटी बैठ जाती है
अभी मौजूद है इस गाँव की मिट्टी में ख़ुद्दारी
अभी बेवा की ग़ैरत से महाजन हार जाता है
मालूम नहीं कैसे ज़रूरत निकल आई
सर खोले हुए घर से शराफ़त निकल आई
इसमें बच्चों की जली लाशों की तस्वीरें हैं
देखना हाथ से अख़बार न गिरने पाये
ओढ़े हुए बदन पे ग़रीबी चले गये
बहनों को रोता छोड़ के भाई चले गये
किसी बूढ़े की लाठी छिन गई है
वो देखो इक जनाज़ा जा रहा है
आँगन की तक़सीम का क़िस्सा
मैं जानूँ या बाबा जानें
हमारी चीखती आँखों ने जलते शहर देखे हैं
बुरे लगते हैं अब क़िस्से हमॆं भाई —बहन वाले
दीए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है।
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हँसते हुए माँ बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते
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हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
सगी है या कि सौतेली है माँ बच्चे समझते हैं
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हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह
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सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’
रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते
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सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
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मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है
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मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना
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भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े
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लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
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तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा
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इस चेहरे में पोशीदा है इक क़ौम का चेहरा
चेहरे का उतर जाना मुनासिब नहीं होगा
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अब भी चलती है जब आँधी कभी ग़म की ‘राना’
माँ की ममता मुझे बाहों में छुपा लेती है
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मुसीबत के दिनों में हमेशा साथ रहती है
पयम्बर क्या परेशानी में उम्मत छोड़ सकता है
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जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा
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देख ले ज़ालिम शिकारी ! माँ की ममता देख ले
देख ले चिड़िया तेरे दाने तलक तो आ गई
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मुझे भी उसकी जदाई सताती रहती है
उसे भी ख़्वाब में बेटा दिखाई देता है
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मुफ़लिसी घर में ठहरने नहीं देती उसको
और परदेस में बेटा नहीं रहने देता
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अगर स्कूल में बच्चे हों घर अच्छा नहीं लगता
परिन्दों के न होने पर शजर अच्छा नहीं लगता
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गले मिलने को आपस में दुआयें रोज़ आती हैं
अभी मस्जिद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
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कभी —कभी मुझे यूँ भी अज़ाँ बुलाती है
शरीर बच्चे को जिस तरह माँ बुलाती है
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किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
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ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
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इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
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मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
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मेरा खुलूस तो पूरब के गाँव जैसा है
सुलूक दुनिया का सौतेली माओं जैसा है
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रौशनी देती हुई सब लालटेनें बुझ गईं
ख़त नहीं आया जो बेटों का तो माएँ बुझ गईं
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वो मैला—सा बोसीदा—सा आँचल नहीं देखा
बरसों हुए हमने कोई पीपल नहीं देखा
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कई बातें मुहब्बत सबको बुनियादी बताती है
जो परदादी बताती थी वही दादी बताती है
हादसों की गर्द से ख़ुद को बचाने के लिए
माँ ! हम अपने साथ बस तेरी दुआ ले जायेंगे
हवा उड़ाए लिए जा रही है हर चादर
पुराने लोग सभी इन्तेक़ाल करने लगे
ऐ ख़ुदा ! फूल —से बच्चों की हिफ़ाज़त करना
मुफ़लिसी चाह रही है मेरे घर में रहना
हमें हरीफ़ों की तादाद क्यों बताते हो
हमारे साथ भी बेटा जवान रहता है
ख़ुद को इस भीड़ में तन्हा नहीं होने देंगे
माँ तुझे हम अभी बूढ़ा नहीं होने देंगे
जब भी देखा मेरे किरदार पे धब्बा कोई
देर तक बैठ के तन्हाई में रोया कोई
ख़ुदा करे कि उम्मीदों के हाथ पीले हों
अभी तलक तो गुज़ारी है इद्दतों की तरह
घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझको मत रोक मुझे लौट के घर जाना है
यहीं रहूँगा कहीं उम्र भर न जाउँगा
ज़मीन माँ है इसे छोड़ कर न जाऊँगा
स्टेशन से वापस आकर बूढ़ी आँखें सोचती हैं
पत्ते देहाती रहते हैं फल शहरी हो जाते हैं
अब देखिये कौम आए जनाज़े को उठाने
यूँ तार तो मेरे सभी बेटों को मिलेगा
अब अँधेरा मुस्तक़िल रहता है इस दहलीज़ पर
जो हमारी मुन्तज़िर रहती थीं आँखें बुझ गईं
अगर किसी की दुआ में असर नहीं होता
तो मेरे पास से क्यों तीर आ के लौट गया
अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
कहीं बे्नूर न हो जायें वो बूढ़ी आँखें
घर में डरते थे ख़बर भी मेरे भाई देते
क्या जाने कहाँ होते मेरे फूल-से बच्चे
विरसे में अगर माँ की दुआ भी नहीं मिलती
कुछ नहीं होगा तो आँचल में छुपा लेगी मुझे
माँ कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी
क़दमों में ला के डाल दीं सब नेमतें मगर
सौतेली माँ को बच्चे से नफ़रत वही रही
धँसती हुई क़ब्रों की तरफ़ देख लिया था
माँ बाप के चेहरों मी तरफ़ देख लिया था
कोई दुखी हो कभी कहना नहीं पड़ता उससे
वो ज़रूरत को तलबगार से पहचानता है
किसी को देख कर रोते हुए हँसना नहीं अच्छा
ये वो आँसू हैं जिनसे तख़्ते—सुल्तानी पलटता है
दिन भर की मशक़्क़त से बदन चूर है लेकिन
माँ ने मुझे देखा तो थकन भूल गई है
दुआएँ माँ की पहुँचाने को मीलों मील जाती हैं
कि जब परदेस जाने के लिए बेटा निकलता है
दिया है माँ ने मुझे दूध भी वज़ू करके
महाज़े-जंग से मैं लौट कर न जाऊँगा
खिलौनों की तरफ़ बच्चे को माँ जाने नहीं देती
मगर आगे खिलौनों की दुकाँ जाने नहीं देती
दिखाते हैं पड़ोसी मुल्क आँखें तो दिखाने दो
कहीं बच्चों के बोसे से भी माँ का गाल कटता है
बहन का प्यार माँ की मामता दो चीखती आँखें
यही तोहफ़े थे वो जिनको मैं अक्सर याद करता था
बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है
बड़ी बेचारगी से लौटती बारात तकते हैं
बहादुर हो के भी मजबूर होते हैं दुल्हन वाले
खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से
बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही
मेरा बचपन था मेरा घर था खिलौने थे मेरे
सर पे माँ बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था
मुक़द्दस मुस्कुराहट माँ के होंठों पर लरज़ती है
किसी बच्चे का जब पहला सिपारा ख़त्म होता है
मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ
जिसके माँ बाप को रोते हुए मर जाना है
मिलता—जुलता हैं सभी माँओं से माँ का चेहरा
गुरूद्वारे की भी दीवार न गिरने पाये
मैंने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़—ए—माँ रहने दिया
घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गईं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गईं
मैदान छोड़ देने स्र मैं बच तो जाऊँगा
लेकिन जो ये ख़बर मेरी माँ तक पहुँच गई
‘मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती
मिट्टी लिपट—लिपट गई पैरों से इसलिए
तैयार हो के भी कभी हिजरत न कर सके
मुफ़्लिसी ! बच्चे को रोने नहीं देना वरना
एक आँसू भरे बाज़ार को खा जाएगा
मुझे खबर नहीम जन्नत बड़ी कि माँ लेकिन
लोग कहते हैं कि जन्नत बशर के नीचे है
मुझे कढ़े हुए तकिये की क्या ज़रूरत है
किसी का हाथ अभी मेरे सर के नीचे है
बुज़ुर्गों का मेरे दिल से अभी तक डर नहीं जाता
कि जब तक जागती रहती है माँ मैं घर नहीं जाता
मोहब्बत करते जाओ बस यही सच्ची इबादत है
मोहब्बत माँ को भी मक्का—मदीना मान लेती है
माँ ये कहती थी कि मोती हैं हमारे आँसू
इसलिए अश्कों का का पीना भी बुरा लगता है
परदेस जाने वाले कभी लौट आयेंगे
लेकिन इस इंतज़ार में आँखें चली गईं
शहर के रस्ते हों चाहे गाँव की पगडंडियाँ
माँ की उँगली थाम कर चलना मुझे अच्छा लगा
मैं कोई अहसान एहसान मानूँ भी तो आख़िर किसलिए
शहर ने दौलत अगर दी है तो बेटा ले लिया
अब भी रौशन हैं तेरी याद से घर के कमरे
रौशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको
मेरे चेहरे पे ममता की फ़रावानी चमकती है
मैं बूढ़ा हो रहा हूँ फिर भी पेशानी चमकती है
वो जा रहा है घर से जनाज़ा बुज़ुर्ग का
आँगन में इक दरख़्त पुराना नहीं रहा
वो तो लिखा के लाई है क़िस्मत में जागना
माँ कैसे सो सकेगी कि बेटा सफ़र में है
३९.
शाहज़ादे को ये मालूम नहीं है शायद
माँ नहीं जानती दस्तार का बोसा लेना
आँखों से माँगने लगे पानी वज़ू का हम
काग़ज़ पे जब भी देख किया माँ लिखा हुआ
अभी तो मेरी ज़रूरत है मेरे बच्चों को
बड़े हुए तो ये ख़ुद इन्त्ज़ाम कर लेंगे
मैं हूँ मेरा बच्चा है खिलौनों की दुकाँ है
अब कोई मेरे पास बहाना भी नहीं है
ऐ ख़ुदा ! तू फ़ीस के पैसे अता कर दे मुझे
मेरे बच्चों को भी यूनिवर्सिटी अच्छी लगी
भीख से तो भूख अच्छी गाँव को वापस चलो
शहर में रहने से ये बच्चा बुरा हो जाएगा
खिलौनों के लिए बच्चे अभी तक जागते होंगे
तुझे ऐ मुफ़्लिसी कोई बहाना ढूँढ लेना है
ममता की आबरू को बचाया है नींद ने
बच्चा ज़मीं पे सो भी गया खेलते हुए
मेरे बच्चे नामुरादी में जवाँ भी हो गये
मेरी ख़्वाहिश सिर्फ़ बाज़ारों को तकती रह गई
बच्चों की फ़ीस, उनकी किताबें, क़लम, दवात
मेरी ग़रीब आँखों में स्कूल चुभ गया
वो समझते ही नहीं हैं मेरी मजबूरी को
इसलिए बच्चों पे ग़ुस्सा भी नहीं आता है
किसी भी रंग को पहचानना मुश्किल नहीं होता
मेरे बच्चे की सूरत देख इसको ज़र्द कहते हैं
धूप से मिल गये हैं पेड़ हमारे घर के
मैं समझती थी कि काम आएगा बेटा अपना
फिर उसको मर के भी ख़ुद से जुदा होने नहीं देती
यह मिट्टी जब किसी को अपना बेटा मान लेती है
तमाम उम्र सलामत रहें दुआ है मेरी
हमारे सर पे हैं जो हाथ बरकतों वाले
हमारी मुफ़्लिसी हमको इजाज़त तो नहीं देती
मगर हम तेरी ख़ातिर कोई शहज़ादा भी देखेंगे
माँ—बाप की बूढ़ी आँखों में इक फ़िक़्र—सी छाई रहती है
जिस कम्बल में सब सोते थे अब वो भी छोटा पड़ता है
दोस्ती दुश्मनी दोनों शामिल रहीं दोस्तों की नवाज़िश थी कुछ इस तरह
काट ले शोख़ बच्चा कोई जिस तरह माँ के रुख़सार पर प्यार करते हुए
माँ की ममता घने बादलों की तरह सर पे साया किए साथ चलती रही
एक बच्चा किताबें लिए हाथ में ख़ामुशी से सड़क पार करते हुए
दुख बुज़ुर्गों ने काफ़ी उठाए मगर मेरा बचपन बहुत ही सुहाना रहा
उम्र भर धूप में पेड़ जलते रहे अपनी शाख़ें समरदार करते हुए
चलो माना कि शहनाई मसर्रत की निशानी है
मगर वो शख़्स जिसकी आ के बेटी बैठ जाती है
अभी मौजूद है इस गाँव की मिट्टी में ख़ुद्दारी
अभी बेवा की ग़ैरत से महाजन हार जाता है
मालूम नहीं कैसे ज़रूरत निकल आई
सर खोले हुए घर से शराफ़त निकल आई
इसमें बच्चों की जली लाशों की तस्वीरें हैं
देखना हाथ से अख़बार न गिरने पाये
ओढ़े हुए बदन पे ग़रीबी चले गये
बहनों को रोता छोड़ के भाई चले गये
किसी बूढ़े की लाठी छिन गई है
वो देखो इक जनाज़ा जा रहा है
आँगन की तक़सीम का क़िस्सा
मैं जानूँ या बाबा जानें
हमारी चीखती आँखों ने जलते शहर देखे हैं
बुरे लगते हैं अब क़िस्से हमॆं भाई —बहन वाले
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